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'पाकिस्तान में हॉकी का कोई मुस्तकबिल नहीं दिखता'

'पाकिस्तान में हॉकी का कोई मुस्तकबिल नहीं दिखता'

ओलंपिक से चार महीने पहले डच कोच को बर्खास्त करने के पाकिस्तान हॉकी महासंघ के फैसले को अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला बताते हुए उसके सबसे अनुभवी खिलाड़ियों वसीम अहमद और शकील अब्बासी ने कहा है कि यही हालात रहे तो पाकिस्तान में हॉकी खत्म हो जाएगी।
    
पीएचएफ ने अनुबंध के उल्लंघन का हवाला देकर गुरुवार को हॉलैंड के कोच मिशेल वॉन डेन हावेल को पद से हटा दिया। बीजिंग ओलंपिक 2008 में आठवें और विश्वकप 2010 में सबसे नीचे 12वें स्थान पर रही पाकिस्तानी टीम ने हावेल के मार्गदर्शन में ग्वांग्क्षू में 2010 में हुए एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।
    
पाकिस्तान के लिए सबसे ज्यादा (410) अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके पूर्व कप्तान वसीम ने कहा कि दो साल से मिशेल ने ही पाकिस्तान की बेहतर टीम बनाई है और निश्चित तौर पर उनके जाने से ओलंपिक में प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। अभ्यास का वह स्तर नहीं रह जाएगा और पेशेवरपन भी नहीं होगा।
     
उन्होंने कहा कि पीएचएफ ने पहले सोहेल अब्बास और रेहान बट जैसे सीनियर खिलाड़ियों को पहले टीम से बाहर कर दिया और फिर विश्व सीरिज हॉकी में खेल रहे खिलाड़ियों पर प्रतिबंध का ऐलान किया। कोच को उसकी मनचाही टीम नहीं मिली और उसके काम में भी काफी दखल हो रहा था लिहाजा ओलंपिक से पहले ये आसार अच्छे नहीं है।

वहीं अब्बासी ने कहा कि ओलंपिक में जूनियर टीम भेजना पैसे की बर्बादी भर है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में हॉकी का कोई मुस्तकबिल मुझे नजर नहीं आ रहा। ओलंपिक के लिए जूनियरों की टीम भेज रहे हैं और कोच को बर्खास्त कर दिया। लंदन ओलंपिक में सिर्फ पैसे की बर्बादी के लिए जाने का क्या मतलब है।
     
अब्बासी ने कहा कि पीएचएफ की तानाशाही से पाकिस्तान में धीरे धीरे हॉकी खत्म हो रही है। उन्होंने कहा कि घरेलू टूर्नामेंटों में 30 बरस से अधिक उम्र के खिलाड़ियों पर पहले ही बंदिश लगा दी है। उसके बाद विश्व सीरिज में खेल रहे सीनियर खिलाड़ियों को भी बाहर कर दिया। पता नहीं पाकिस्तान में हॉकी का अब क्या होगा।
      
अहमद ने कहा कि विदेशी कोच के बिना अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करना बेमानी है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में समय के साथ हाकी बदली है और यूरोपीय टीमें हमसे काफी आगे चली गई हैं। हमारे यहां पुराने ओलंपियन खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं लेकिन हमें यह मानना होगा कि समय के साथ चलने के लिए यूरोपीयों या ऑस्ट्रेलियाई कोचों से सीखना जरूरी है। टीम को विदेशी कोच चाहिए और उसे समय भी देना होगा।

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