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दिल्ली तो मेरा दिल है

जाने-माने गजल गायक सतीश बब्बर को दिल्ली इतनी पसंद है कि वे दिल्ली से दूर जाने की कभी सोचते भी नहीं। अपने दिल की तरह दिल्ली से प्यार करने वाले सतीश बब्बर से सत्य सिन्धु ने बातचीत की।

दिल्ली आपको कैसी लगती है?
दिल्ली हमारा दिल है और दिल से बेहतर भला क्या होगा! दिल से गाता हूं और दिल से ही रिश्ता बनाता हूं। धुन भी दिल से निकलने वाली चीज है, दिमाग तो उलझन वाले काम करता है, लेकिन मैं दिल वाला काम करता हूं। इसलिए मेरा दिल और मेरी दिल्ली मुझे बहुत प्रिय हैं।

दिल्ली की खूबियां क्या-क्या हैं?
दिल की सबसे बड़ी खूबी तो यही है कि जो एक बार दिल्ली में आकर बस जाता है, दिल्ली का होकर रह जाता है। दिल्ली तो हमारे दिल की तरह देश का ऐसा हिस्सा है, जिससे अलग होकर हम रह नहीं सकते। बड़े-बड़े लोग दिल्ली आये और दिल्ली में ही बस गये। मुझे मुम्बई में कई बार अभिनय के मौके मिले, लेकिन मैं वहां नहीं गया। मनमोहन देसाई, रामानंद सागर, शक्ति सामंत जैसे कई फिल्मकारों ने मुम्बई में रहने की सलाह दी, लेकिन दिल्ली को मैं छोड़ नहीं सकता था। कितनी ही खूबिया हैं दिल्ली में।

और खामियां क्या-क्या हैं?
मुझे दिल्ली में कोई खामी नजर नहीं आती, मैं खामी अपने अन्दर ढूंढ़ता हूं कि कहीं मेरी वजह से दिल्ली को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है। दिल्ली में तो आज भी फूलवालों की सैर मशहूर है।

दिल्ली काफी बदल गयी है, क्या बदलाव पाते हैं?
काफी बदली है दिल्ली और काफी सुन्दर भी लगती है। सरकार ने बहुत काम किया है, लेकिन हमें भी चाहिए कि दिल्ली की अच्छी तरह देखभाल करें।

आपको कौन-कौन से बदलाव अच्छे लगते हैं?
सबसे बड़ी बात है कि हमारे 40 साल पुराने दोस्त आज भी वैसे ही मिलते हैं और एक-दूसरे के लिए दुआएं करते हैं, जैसे पहले मिलते थे, दुआएं करते थे। ये सब चीजें बची हुई हैं। जो बदलाव आये भी हैं, वे काफी उत्साहित करने वाले है। कनॉट प्लेस बिल्कुल निखर गया। सड़के और फ्लाईओवर्स अच्छे हो गए हैं। अब तो मेट्रो की सौगात भी दिल्ली वालों को मिल गई है। मुझे जो बात अच्छी नहीं लगती, वह है सड़क किनारे लोगों का सोना।

सांस्कृतिक माहौल में क्या-क्या बदलाव पाते हैं?
दिल्ली की संस्कृति अतुलनीय है। चाहे पुराने किले में सूफी संगीत की संध्या हो या कुतुबमीनार पर रॉक कार्यक्रम। मंडी हाउस में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम हों या नाट्य प्रस्तुतियां, कला प्रेमियों का उत्साह और उमंग देखते ही बनता है। दिल्ली में कला और संगीत के दीवानों की कमी नहीं। मुझे संगीत में जो बात परेशान करती, वह है डीजे कल्चर, जिसमें गानों और धुनों को मिला कर कानफोड़ संगीत तैयार कर दिया जाता है। लेकिन ऐसे संगीत तात्कालिक होते हैं, दिल्ली के असली स्वाद में ज्यादा समय तक बने नहीं रह पाते।

यहां की कौन-कौन सी जगहें बहुत पसंद हैं?
दिल्ली विश्वविद्यालय मुझे बहुत पसंद है। यहां की पुरानी इमारतें, खूबसूरत सड़कें और दुकानें सब पसंद हैं मुझे। इसके अलावा लाल किला, जामा मस्जिद, चांदनी चौक व अन्य ऐतिहासिक इमारतें मुङो बहुत पसंद हैं। ये सभी हमें दिल्ली की ऐतिहासिक भव्यता और पुरातात्विक समृद्धि से जोड़ती हैं।

खाने-पीने की कौन -कौन सी जगहें पसंद हैं?
जो खाना दिल्ली में मिलता है, वह दुनिया में कहीं और कहां। चाइनीज फूड के लिए मैं होटल मौर्या, ताज और ली मेरेडियन जाना पसंद करता हूं। जामा मस्जिद में करीम होटल, ग्रेटर कैलाश में मोती महल और स्नैक्स खाने के लिए रोशनआरा क्लब में जाना अच्छा लगता है। होटल ओबेराय में भी तरह-तरह के व्यंजन हैं, जो मुङो अपनी तरफ खींचते हैं। जलेबी खाना हो तो चांदनी चौक जाता हूं। परांठे वाली गली में जाकर परांठे खाना भी नहीं भूलता।

दिल्ली की किन जगहों को मिस करते हैं?
मैं दिल्ली को मिस नहीं करता। दिल्ली को मिस नहीं करूं, इसलिए तो दिल्ली से बाहर नहीं गया। दिल्ली में जहां भी जाना चाहता हूं, वहां के लिए समय निकाल लेता हूं। दिल्ली विश्वविद्यालय की चाय पीने की इच्छा होती है तो पंडितजी के ढाबे पर पहुंच ही जाता हूं।

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