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कम विकास में उम्मीद की किरणें

आर्थिक सर्वेक्षण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की जो तस्वीर पेश की है, वह मिली-जुली है। इसका विश्लेषण बताता है कि हालांकि विकास में गिरावट दर्ज हुई है, लेकिन यह गिरावट अपने निचले स्तर पर पहुंच चुकी है और अगले वित्त वर्ष में इसके ऊपर जाने की उम्मीद की जा सकती है। सर्वे में 2012-13 के लिए 7.6 फीसदी और 2013-14 के लिए 8.6 फीसदी का लक्ष्य रखा गया है, जो काफी उम्मीद बंधाता है।

हालांकि 12वीं योजना में हमने जो नौ फीसदी का लक्ष्य रखा है, यह उससे काफी नीचे है। कम विकास दर के लिए सर्वे का इशारा सही जगह पर है, इसकी वजह एक तो कम औद्योगिक विकास दर और दूसरी, निवेश दर में कमी रही। खासकर कंपनी क्षेत्र में निवेश तेजी से गिरा, यह 2007-08 में 17.1 फीसदी था, जो पिछले वित्त वर्ष में घटकर 12.1 फीसदी पर आ गया।

अगर औद्योगिक विकास दर में नई जान नहीं फूंकी गई, तो न सिर्फ कुलजमा विकास दर में कमी आएगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी नहीं पैदा होंगे। भारत जैसे देश के लिए यह बहुत जरूरी है, जहां हर साल डेढ़-दो करोड़ कामगार बढ़ जाते हैं। सर्वे का कहना है कि उद्योगों की अधिकतम संभावनाओं को व्यावसायिक आत्मविश्वास बहाल करके, अधिक उत्पादन बढ़ाने वाले निवेश से और बाधाओं को दूर करके ही हासिल किया जा सकता है।

यह भी कहा गया है कि मेन्यूफैक्चिरिंग को बढ़ाने पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा, क्योंकि अगर औद्योगिक क्षेत्र के विकास दर को 14 फीसदी तक पहुंचाना, है तो मेन्युफैक्चिरिंग की विकास दर 2022 तक 25 फीसदी पर पहुंच जानी चाहिए। इसके लिए जो कुछ तरीके सुझाए गए हैं, उनमें हैं प्रस्तावित मैन्युफैक्चरिंग जोन और कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए जमीन उपलब्ध कराना, हाई वैल्यू एडीशन उद्योगों को प्राथमिकता देना तथा अधिक  प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना आदि। इसमें अगर लघु व मध्यम उद्योगों की तकनीक, गुणवत्ता और फाइनेंसिंग को सुधारने का काम भी शामिल किया जाए, तो ज्यादा बेहतर होगा।

हालांकि महंगाई थोड़ी काबू में आई है, लेकिन यह समस्या अभी बनी हुई है। आर्थिक सर्वे का इसके लिए सुझाव है आपूर्ति बढ़ाने का, खासकर खाद्य पदार्थो की। इन सुझावों में कृषि उत्पादों के आयात और मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात भी शामिल है। इस मामले में हमारा सुझाव यह रहा है कि उत्पादकता बढ़ाने के लिए जमीन के लीजिंग नियमों की समीक्षा की जानी चाहिए। इसके अलावा जल्द खराब होने वाले कृषि उत्पादों को कृषि उत्पाद मार्केटिंग ऐक्ट से भी मुक्त कर देना चाहिए, साथ ही उनके स्टोरेज, संचार व इन्फ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देनी चाहिए।

आर्थिक सर्वे में 11वीं योजना के तहत निजी-सार्वजनिक गठजोड़ से बनाए गए इन्फ्रास्ट्रक्चर की प्रशंसा की गई है। इससे निजी क्षेत्र में निवेश हुआ और सेवा क्षेत्र में कुशलता आई है। 12वीं योजना में भी इन्फ्रास्ट्रक्चर के ऐसे ही विकास के लिए वित्तीय संस्थानों को मजबूत बनाने और लांग टर्म बांड को विकसित करने के अच्छे सुझाव शामिल हैं। हमारा एक सुझाव यह भी है कि ऊर्जा क्षेत्र के लिए कदम उठाए जाने चाहिए और कोयले की नियमित आपूर्ति की व्यवस्था की जानी चहिए।

देश का सेवा क्षेत्र हमारी जीडीपी में 59 फीसदी का योगदान दे रहा है, और इस साल भी इसकी विकास दर 9.4 फीसदी रही है। सर्वे में इस क्षेत्र की चुनौतियों का जिक्र किया गया है। हमारा मानना है कि ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए, जिनसे इस क्षेत्र की बाकी बची संभावनाओं का पूरा फायदा उठाया जा सके। मसलन स्वास्थ्य क्षेत्र में और ज्यादा निजी निवेश हो सकता है अगर इसे इन्फ्रास्ट्रक्चर मानते हुए इस पर निजी-सार्वजनिक मॉडल अपनाया जाए।

सर्वे में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों में जिस प्रगति का जिक्र किया गया है, वह उत्साहजनक है। प्राथमिक शिक्षा में दाखिल होने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है, इसके साथ ही आकाश टैबलेट का इस्तेमाल इस क्षेत्र की प्रमुख बातें हैं। लेकिन फिर भी हम शिक्षा पर जीडीपी का 3.11 फीसदी और स्वास्थ्य पर 1.3 फीसदी खर्च कर रहे हैं, जो बहुत ही कम रकम है। निजी क्षेत्र भी इसमें अपनी भूमिका निभा सकता है।

यह जरूरी है कि कुशलता के विकास पर खास ध्यान दिया जाए, क्योंकि देश में कुशल कामगारों की खासी कमी है, क्योंकि हमारे यहां कुशलता के विकास के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। इसके लिए एक कुशलता विकास बैंक बनाया जाना चाहिए, जिसका लक्ष्य हो 2020 तक 50 करोड़ लोगों को कुशल बनाना। यह बैंक छात्रों, संस्थानों और नए उद्यमियों को कर्ज देने का काम करे।

चालू वित्त वर्ष में दुनिया के खराब आर्थिक हालात के बावजूद हमारा निर्यात अप्रैल से जनवरी के बीच 23 फीसदी की दर से बढ़ा है। हमने निर्यात के लिए एशिया और दूसरे विकासशील बाजारों की ओर जिस तरह से ध्यान दिया, यह उसी की वजह से संभव हो सका है। हालांकि सर्वे में यह स्वीकार किया गया कि भारत जिन चीजों को सबसे ज्यादा निर्यात कर रहा है, उन सबके बाजार में भारत की हिस्सेदारी बहुत कम है, जिसे व्यापार की सुविधाएं बढ़ाकर और इन्फ्रास्ट्रक्चर की बाधाएं हटाकर सुधारा जा सकता है।

हमारा मानना है कि इन सबकी वजह से भारतीय उत्पादों की कीमत 15 से 20 फीसदी तक बढ़ जाती है और भारतीय उत्पादकों को दुनिया के बाजार में इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। आर्थिक सर्वे में पहली बार टिकाऊ विकास और पर्यावरण में बदलाव के मसलों को भी शामिल किया गया है। यह स्वागत योग्य है, क्योंकि पूरी दुनिया का ध्यान फिलहाल इसी मसले पर है। इस दोनों ही क्षेत्रों में भारत ने काफी अच्छी कोशिशें की हैं।

सर्वे में बताया गया है कि सरकार पिछले वित्त वर्ष से वित्तीय संतुलन साधने की कोशिश कर रही है, लेकिन मंदी और कम प्राप्तियों के कारण इसके लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सके। इसमें कहा गया है कि वित्तीय घाटा सही दिशा में जा रहा है। हमारा मानना है कि यह संतुलन जितना ज्यादा सधेगा, निजी निवेश उतना ही बढ़ेगा। जरूरी है कि राजस्व बढ़ाया जाए, जबकि खर्च घटाया जाए। यकीनन इसके लिए कर सुधार बहुत जरूरी हैं।
आर्थिक सर्वे ने समस्याओं के जो इलाज बताए हैं, वे हमें सुधारों की ओर ले जाते हैं। उम्मीद है कि इसके आगे अब बजट हमें ज्यादा विकास, ज्यादा निवेश और ज्यादा रोजगार की तरफ ले जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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