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पानी को बुनियादी हक बनाना सबसे जरूरी

राष्ट्रीय जल-नीति के मसौदे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस नीति में सभी नागरिकों को साफ पेयजल व स्वच्छता के लिए जरूरी जल की न्यूनतम मात्र सुनिश्चित करने के लिए तो कहा गया है, पर इसे नागरिकों के बुनियादी अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। साथ ही इस नीति में जलापूर्ति के निजीकरण व उसकी कीमत वसूलने के प्रति जो झुकाव है, उसका सभी नागरिकों को पर्याप्त पेयजल व स्वच्छता के लिए जरूरी जल उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से टकराव होना तय है। यदि जल नीति में पूरा खर्च वसूलने को प्राथमिकता दी जाएगी, तो इससे कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के लिए संकट बढ़ सकता है।

हालांकि इसका कारण यही बताया जा रहा है कि पानी के अपव्यय को रोकना जरूरी है, पर क्या यह काम इसे खरीदने की हैसियत न रखने वाले गरीबों को पानी न उपलब्ध कराने की कीमत पर किया जा सकता है? पानी के अपव्यय रोकने के नाम पर ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए, जिससे निर्धन परिवारों को जल की उपलब्धता पर प्रतिकूल असर पड़े। अगर हम जल अपव्यय के पैटर्न पर ध्यान दें, तो इसका सबसे ज्यादा अपव्यय होटलों, उद्योगों वगैरह में होता है। पानी की बर्बादी रोकने के लिए पानी को महंगा करने की बजाय इसका एक सीमा से अधिक इस्तेमाल करने वालों पर भारी टैक्स और जरूरत पड़ने पर दंड लगाए जाने के प्रावधान किए जाने चाहिए। इसके साथ ही जल के औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए असरदार कार्रवाई की जरूरत है।

जल-उपयोग में पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि बराबरी के आधार पर सभी नागरिकों को पेयजल व स्वच्छ जल की आपूर्ति हो। गरीब से गरीब व्यक्ति को भी इस बुनियादी जरूरत से वंचित न किया जाए। सभी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराके हम अपनी स्वास्थ्य सेवा के सिरदर्द को भी कुछ हद तक कम कर सकते हैं, क्योकि देश में कई महामारियां गंदे पानी की वजह से होती हैं। स्कूलों, अस्पतालों जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों की जलापूर्त्ति पर विशेष ध्यान दिया जाए। बेघर लोगों व अन्य जरूरतमंद लोगों के लिए सड़कों व बाजारों में सरकार को नि:शुल्क साफ पेयजल की व्यवस्था करनी चाहिए।

दूसरी प्राथमिकता खेती के लिए पानी को मिलनी चाहिए। इसमें भी छोटे किसानों व खाद्य फसलों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पेयजल व जरूरी सिंचाई की जल आपूर्ति के बाद ही अन्य आवश्यकताओं पर विचार करना चाहिए। जल संकट से प्रभावित क्षेत्रों में जल का अपव्यय करने वाले उद्योगों, खदानों, जल-सघन व्यापारिक फसलों  पर रोक लगनी चाहिए। अगर हमारी सोच यह है कि देश में कहीं जल संकट न हो और हम भावी पीढ़ियों के हाथों जल के संसाधन सुरक्षित सौंप सकें, तो इसके लिए अपेक्षित उपायों को महत्व देना होगा, जल की कीमत को नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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