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सावधान, बजट आ रिया है जनाब

मार्च का महीना वेतनजीवियों के लिए दुखदायी होता है। आदि से अंत तक यह रक्तचाप स्थिर नहीं रहने देता। मुनादी हो चुकी है, बजट आने वाला है। ‘अर्थ’ का होल्डाल संभाले, यात्री-गण कृपया ध्यान दें, बजट आने वाला है। शेयर बाजार में ‘अर्थ’-क्वेक। हिल जाएगी शेयर धारकों की जमीन। आखिरकार, पधारने वाले हैं बजट महाराज। पहले से ही महंगी कमबख्त न जाने कौन-सी चीज और महंगी हो जाए।

बजट कठोर होगा, ऐसा संकेत अपने प्रोनोब दा पहले ही दे चुके हैं। वह चिंतित हैं कि प्रति-व्यक्ति आय घट रही है। इन्हें भी ‘बिरादरी’ के निरंतर बढ़ते श्याम-धन की चमक एंटी ग्लेयर चश्मे से नजर नहीं आती। वेतनजीवियों का मन भयभीत है। आसानी से पकड़ में आ जाती है उनकी गर्दन। वह आय पर भी कर देते हैं और हाय करके रह जाते हैं। गऊ-ग्रास की तरह निकालना पड़ता है सरकारी हिस्सा।

मार्च में सालाना झुंझलाहट होती है, क्यों किया था मामूली-सा बीए? वाणिज्य थोड़ा कठिन विषय था। उन दिनों भी तो रहा होगा एमबीए। उस काल खंड के एवरेज फादर इसी फिकर में रहते थे कि पुत्तर जल्दी से ग्रेजुएट हो कुछ कमाए-धमाए, जिससे उनके घर का ‘बजट’ सुधरे। बजट  एक अति रोचक नितांत आवश्यक सरकारी अनुष्ठान है। बजट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना एक राष्ट्र्रीय कला है। यह अर्थ-शास्त्रियों का शास्त्रर्थ है। वित्त का विश्लेषण है। कॉमन आदमी के चित्त की दशा जानने के इच्छुक ‘मीडिया’-करों  की विचित्र एक्सरसाइज है।

वंस अपॉन अ टाइम, समाज-सुधारक टाइप वित्त मंत्री हुआ करते थे। सिगरेट, शराब पर टैक्स लगा देशवासियों के बिगड़ते चरित्र को सुधारने के प्रयास करते थे। अबके वित्त मंत्री शेरो-शायरी भी करने लगे हैं। यश के वाहक एक वित्त मंत्री ने ‘अर्थ’ को अनर्थ होने से बचाने के लिए ललकारा था- तकाजा है वक्त का तूफां से जूझो, कहां तक चलोगे किनारे-किनारे।

इस मंद बुद्धि को अब समझ में आ रिया है कि दुनिया के बाजार में हमारी किश्ती डूबने न पाए, इसीलिए लगाए जाते हैं टैक्स। आओ बजट जी पधारो, सरकार की किस्मत संवारो।
अशोक सण्ड

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