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खौफनाक जलजले की यादें

टोक्यो में एक विशाल इमारत की छठी मंजिल के हॉल में मेरा बैठना होता है। दोपहर के करीब पौने दो बजे जब उसने दस्तक दी, तो उस पल अहसास हुआ था, मानो यह विशाल हॉल लहरों पर धरा हो। शुरू में कोई खास सुगबुगाहट नहीं हुई, लेकिन फिर चेहरों का रंग उड़ना और डेस्क के नीचे हो जाने की घोषणा। करीब पांच या छह मिनट का वो वक्फा सदियां बनकर गुजरा। तो क्यो शहर में भूकंप करीब सात के आसपास बताया गया, लेकिन सबसे बड़े फैशनेबल और भीड़ भरे इलाकों में शुमार शिबुया में मुझे कोई अफरा-तफरी नहीं दिखी सिवा इसके कि लोग तबाही के दृश्य रात के दो बजे भी सड़कों के किनारे लगी स्क्रीन्स पर देख रहे थे और स्मोकिंग जोन की बजाय सड़क पर ही सिगरेट पी रहे थे...बस।

उस रात, मैं भारी भीड़ के बावजूद ढ़ाई बजे आराम से ट्रेन पकड़कर घर पहुंचा गया था। घर में अलमारियों के पल्ले खुले हुए थे और आफ्टर शेव लोशन की खाली शीशी वाश-बेसिन में गिरी पड़ी थी, मेज घड़ी और टेलीफोन सरककर किनारे आ गए थे और गिरने से बाल-बाल बच गए थे। अपनी टेक्नोलॉजी के बल पर जापान ने दुनिया के सबसे भयंकर भूकंप को जीत लिया था, लेकिन समंदर पर किसका जोर है और अगर जमीन ही पैरों के नीचे से फटकर सरक जाए, तो किसके कल्ले में ताकत है, जो उसे रोक ले। लेकिन जिस तेजी से जापान ने इस महाआपदा का मुंहतोड़ जवाब दिया है, वह बताता है कि जीना और मरना जैसा जापानी जानता है, उसके लिए एक सैल्यूट तो बनता ही है।
मैखाना में मुनीश

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