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किराये पर विवाद

रेल बजट को लेकर केंद्र सरकार और तृणमूल के बीच जो तकरार हुई है, उसका अंत क्या होगा यह तो आने वाले वक्त में तय होगा, लेकिन इसने गठबंधन सरकारों की समस्याओं में एक नया आयाम जोड़ा है। केंद्र में गठबंधन सरकारों का युग शुरू हुए काफी वक्त गुजर गया है और यह उम्मीद करना स्वाभाविक है कि तमाम पार्टियों को गठबंधन में रहने और उन्हें चलाने का पर्याप्त अनुभव हो चुका है। फिलहाल केंद्र में गठबंधन सरकारों के युग के खात्मे का भी कोई संकेत नहीं है, क्योंकि कोई पार्टी अपने बूते पर बहुमत हासिल करने की स्थिति में नहीं है।

लेकिन अगर कोई यह मानता है कि गठबंधन राजनीति के सारे खतरे और झटके वह समझ चुका है, तो यह गलत है। इस प्रकरण ने सिद्ध किया है कि अब भी अप्रत्याशित झटके देने की क्षमता राजनेताओं में है। यह स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि रेल मंत्री अपना बजट पूरा पढ़ भी न पाए हों और उनका पद छिनने की तैयारी होने लगी हो। भारतीय लोकतंत्र में यह भी एक अनोखा दृश्य था कि बजट पेश करने वाले मंत्री की पार्टी के सांसद ही बजट प्रस्तावों के खिलाफ धरने पर बैठे हों। खबर तो यह भी आ रही थी कि ममता बनर्जी रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की तुरंत बरखास्तगी चाहती थीं। अगर ऐसा होता, तो यह अभूतपूर्व घटना होती, लेकिन यह संकट फिलहाल टाल दिया गया।

वैसे यह मुश्किल लगता है कि रेल मंत्री ने रेल बजट के बारे में अपनी नेता से पहले बात न की हो। अगर ऐसा है, तो ममता बनर्जी ने जान-बूझकर स्थिति को विस्फोटक बनाया, अगर ऐसा नहीं है, तो दिनेश त्रिवेदी ने सोच-समझकर यह खतरा उठाया। कुछ भी हो, इस प्रकरण ने केंद्र सरकार की साख को और कमजोर किया है। अगर सरकार ममता बनर्जी के आगे झुकती है, तो इससे उसकी छवि और ज्यादा खराब होगी। अगर वह ममता के आगे नहीं झुकती है, तो ममता यह कहकर मैदाने-जंग में आ सकती हैं कि आम आदमी के मुद्दे पर उन्होंने केंद्र से लोहा लिया।

वैसे भी इस सरकार की लगातार यही छवि बन रही है कि यह कुछ फैसले करती है, फिर दबाव में उसे वापस ले लेती है। जाहिर है, ऐसे विवादों से ममता बनर्जी की छवि भी कोई बेहतर नहीं हो रही है। ममता बनर्जी पिछले चुनावों में पाए हुए असाधारण जनसमर्थन को तेजी से गंवाने पर आमादा हैं। संभवत: उनकी राजनीति की शैली ही संघर्ष की है, शांति से प्रशासन चलाना उनके स्वभाव में नहीं है। लेकिन इन संघर्षों के लिए केंद्र सरकार और कांग्रेस में राजनीतिक प्रबंधन की कमी भी जिम्मेदार है। सहयोगियों और राज्य सरकारों की यह शिकायत है कि बड़े फैसले करने से पहले केंद्र सरकार उनसे विचार-विमर्श नहीं करती, इसलिए बार-बार टकराव के मौके आते हैं।

संप्रग की समस्या यह है कि उसके पास ऐसे नेताओं की कमी है, जो सहयोगियों व विपक्ष से लगातार संवाद बनाए रख सके। अगर वह पहले से होमवर्क करके बड़े फैसले करे, तो टकराव की समस्या कम हो सकती है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ये मुद्दे सिर्फ राजनीतिक नहीं हैं, इनसे आर्थिक व प्रशासनिक बातें भी जुड़ी हुई हैं। अगर सरकार ममता बनर्जी के किसी पसंदीदा व्यक्ति को नया रेल मंत्री बनाती है, तो राजनीतिक संकट भले टल जाए, पर भारतीय रेल के भविष्य के लिए यह खराब होगा, जो बड़े आर्थिक संकट के मुहाने पर है। दिनेश त्रिवेदी ने अपने बजट भाषण में कहा था कि वह भारतीय रेल को आईसीयू से बाहर लाए हैं। क्या राजनीतिक वजहों से इसे फिर आईसीयू में डाल दिया जाएगा? संप्रग के कर्ताधर्ताओं की राजनीतिक सूझबूझ का यह सबसे बड़ा इम्तहान है।

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