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प्रणब दा के बजट में ‘मेरे’ लिए क्या?

‘प्रणब दा’ ने वर्ष 2011 के बजट में टैक्स सीमा 1.60 लाख रुपये से बढ़ाकर 1.80 लाख करके आम आदमी को करीब 2060 रुपये सालाना का फायदा पहुंचाया था। यानी आम आदमी की जेब में हर रोज करीब पांच रुपये 64 पैसे की बचत हुई थी। जरा सोचिए कि पांच रुपये 64 पैसे से एक दिन में क्या-क्या किया जा सकता है? जाहिर, इतने पैसों से एक दिन में फुटपाथ की दुकान से एक प्याली चाय जैसी ही कोई चीज हासिल की जा सकती है लेकिन इस बार लोगों को प्रणब दा से बड़ी उम्मीदें हैं। खासकर सर्विस क्लास को जो पांच लाख रुपये सालाना आय तक टैक्स से पूरी तरह मुक्ति चाहता है।

सर्विस वाले चाहते हैं कि बचत योजनाओं में निवेश पर भी छूट की सीमा एक लाख से बढ़ाई जाए। महंगाई में कमी लाए जाने की चाहत तो है ही लेकिन आम बजट से एक आम आदमी कितनी उम्मीदें कर सकता है। गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट के पूर्व शोधार्थी और स्टेट वाटर र्सिोसेज से जुड़े अर्थशास्त्री डॉ. योगेश बंधु कहते हैं, ‘कमोडिटी एक्सचेंज में सट्टेबाजी की वजह से भी कीमतें बढ़ जाती हैं। उत्पादन से बाजार तक ढेरों कारक हैं। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी मायने रखती हैं। ऐसे में एक बजट से महंगाई में उल्लेखनीय कमी की उम्मीदें पालना ठीक नहीं।’
 
गोरखपुर विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के डॉ. संदीप की नजर में बजट में आम आदमी का सरोकार इतना ही होता है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से उसकी जिन्दगी कितनी प्रभावित हो रही है। आयकर प्रत्यक्ष कर का एक रूप है। सो, आम आदमी के लिए देखने वाली बात होगी कि प्रणब दा आयकर में कितनी छूट दे रहे हैं। अंग्रेजी विभाग के डॉ. अजय शुक्ला की मांग है कि आयकर की सीमा पांच लाख रुपये सालाना से ऊपर होनी चाहिए। साथ ही बचत योजनाओं में निवेश से छूट की सीमा भी एक लाख से बढ़ाकर दो-तीन लाख तक किया जाना चाहिए। व्यापारी, उद्यमी वर्ग, महिलाएं और युवा, हर वर्ग के लिए बजट अलग मायने रखता है।

डॉ. संदीप की मानें तो मुख्यत: तीन प्रमुख बातें हैं, जिनका आम आदमी से सीधा रिश्ता है। पहली, बजट से महंगाई नियंत्रित हो रही कि नहीं, आयकर की सीमा में क्या अन्तर आ रहा और उद्योग व इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र कितना सुदृढ़ होता है। महंगाई का नियंत्रण सेल्स, वैट, एक्साइज जैसे अप्रत्यक्ष करों पर निर्भर करता है, तो उद्योग और इन्फ्रास्ट्रक्चर को कॉर्पोरेट टैक्स जैसी छूटों से फायदा मिल जाता है।
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रेपो रेट में कमी न होने का ये है मतलब
गुरुवार को खबर आई कि रिजर्व बैंक ने रेपो रेट, कैश रिजर्व रेशियो (सीआरआर), स्टैचटॉरी लिक्विडिटी रेशियो (एसएलआर) में कोई परिवर्तन नहीं किया है। डॉ. संदीप कहते हैं, ‘मेरी समझ से रिजर्व बैंक को रेपो रेट थोड़ा कम करना चाहिए था। शायद उसे बैंकों के उधार देने की क्षमता में वृद्धि से हाल में कम हुई महंगाई के फिर बढ़ने का अंदेशा हो।’ दरअसल, रेपो रेट, सीआरआर और एसएलआर घटने से बैंकों के उधार देने की क्षमता बढ़ती है। इससे लोगों के बीच ‘मनी सप्लाई’ बढ़ती है। सुस्त अर्थव्यवस्था के दौर में तेजी लाने के लिए केन्द्रीय बैंक रेपो रेट घटा देता है लेकिन बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण के लिए रेपो रेट बढ़ा दिया जाता है।
 डॉ. संदीप के मुताबिक रेपो रेट में परिवर्तन न किए जाने से साफ संकेत मिल रहा है कि महंगाई को कम करना बजट में प्रणब दा की प्राथमिकता होगी।

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  • Web Title:प्रणब दा के बजट में ‘मेरे’ लिए क्या?