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आपके लिए क्या लाएगा बजट!

कल देश का बजट आएगा। सब कयास लगा रहे हैं कि बजट में यह होगा, वह नहीं होगा। फलां चीज महंगी होगी तो फलां चीज सस्ती। शायद करों में छूट मिल जाए। या फिर ब्याज दरें महंगी हो जाएं। कौन-सा कयास सही साबित होगा और कौन-सा गलत, यह तो कल ही पता चलेगा, लेकिन अमूमन जानकारों के अनुमान सही साबित होते हैं। इसीलिए आर्थिक मामलों के जानकार मुकेश बुटानी पूरा आकलन करते हुए बता रहे हैं कि कल पेश होने वाले बजट में उपभोक्ता और कारोबारियों के लिए क्या खास बातें हो सकती हैं।

वार्षिक बजट के आने में मात्र एक दिन का समय रह गया है। सबकी निगाहें देश के सबसे अनुभवी वित्त मंत्री पर टिकी हैं, जिनके सामने विकास, सकल घरेलू उत्पाद, आर्थिक सुधार और इन सबसे ऊपर महंगाई रोकने और सब्सिडी को कम करने जैसी चुनौतियां हैं। इसके अतिरिक्त, बीते पखवाड़े में पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों के बाद भी व्यापार जगत में आर्थिक सुधार की रफ्तार धीमी होने की सुगबुगाहट शुरू हुई है। हालांकि मेरी राय में रिटेल में सीधे विदेशी निवेश (एफडीआई) और बीमा क्षेत्र में एफडीआई लिमिट के अतिरिक्त समग्र आर्थिक सुधारों की दिशा ज्यों की त्यों रहेगी।

करदाताओं की जेब है लक्ष्य
अतिरिक्त सरकारी खर्च, उधार का सीमा निर्धारण और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले दबाव के कारण बजट का मुख्य लक्ष्य कर प्राप्ति को सुचारू करना रहेगा। अगले वित्त वर्ष में 7 से 8 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को देखते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी 20 से 25 प्रतिशत समग्र टैक्स कलेक्शन का लक्ष्य रखेंगे। परोक्ष कर सुधारों में कमजोर सेवाओं को शामिल करते हुए सभी सेवाओं में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का मार्ग भी प्रशस्त किया जाएगा।

इसका एक कारण यह भी है कि मौजूदा सेवा कर कलेक्शन जीडीपी के 6 प्रतिशत से भी कम है और सेवा क्षेत्र जीडीपी का 60 प्रतिशत होने के कारण यह पहल बजट में आर्थिक तौर पर भी सकारात्मक रहेगी। राज्यों के साथ देश के लिए जरूरी मानी जाने वाली टेली कम्युनिकेशन, बीमा और बैंकिंग सेवाओं के कुछ विशिष्ट तत्वों पर मतांतर जारी रहेंगे। इससे हालांकि केंद्र का सुधार की दिशा में बढ़ना रुकेगा नहीं। साथ ही, सभी सेवाओं पर टैक्स लगाने से स्वास्थ्य, शिक्षा और जन यातायात भी इस दायरे में आएगा और इनसे अधिक कर की प्राप्ति होगी।

जीएसटी है दुर्लभ स्वप्न
आज तक अधर में लटके हुए संवैधानिक सुधार प्रस्ताव के कारण जीएसटी का रास्ता भी रुका हुआ है। संसद के ऊपरी सदन में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के हाथ में कमजोर बहुमत होने के कारण अभी जीएसटी विधान बनने की सूरत नजर भी नहीं आती। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में आया दल 2006 से ही स्टेट वैल्यू-एडेड टैक्स (वैट) की खिलाफत कर रहा था। लिहाजा, वित्त मंत्री अभी जीएसटी संबंधी किसी घोषणा से परहेज करेंगे (गत वर्ष के बजट की तरह) और जीएसटी बिल संसद मानसून सत्र में ही उठाएंगे। इस तरह उन्हें इस मुद्दे पर राज्यों से बात करने का समय भी मिल जाएगा। मेरी राय में यदि संवैधानिक सुधार पर मानसून सत्र में एक राय नहीं बनती, तो जीएसटी तीन वर्ष तक अनिश्चितता की गर्त में पहुंच जाएगा।

प्लान पैनल की सिफारिशें
डायरेक्ट टैक्स मोर्चे पर व्यक्तिगत कर दरों में बदलाव, दो अंकों में पहुंच चुकी महंगाई से पार पाने के लिए सेविंग उपायों पर अतिरिक्त छूट ही एजेंडा में शीर्ष पर रहेगी। हालांकि, प्लान पैनल की बड़ी सिफारिशों के अंतर्गत व्यक्तिगत स्तर पर लगने वाले डायरेक्ट टैक्सेस कोड (डीटीसी) को 2013 तक बढ़ा कर नए डीटीसी कानून के साथ नत्थी किया जाएगा। साथ ही हम विदेशी कंपनियों के संबंध में जनरल एंटी-एवॉयडेंस रूल्स (जीएएआर), कंट्रोल्ड फॉरेन कॉपरेरेशन (सीएफसी) रूल्स और एक सख्त प्लेस ऑफ इफेक्टिव मैनेजमेंट (पीओईएम) से जुड़े प्रावधानों का आगमन भी देख सकते हैं।

जीएएआर से जुड़ी आकांक्षा अब तक रुके हुए डीटीसी के ही कारण है, साथ ही वोडाफोन मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के आधार पर, जिसमें टैक्स न देने संबंधी कानून पर जोर दिया गया है। गत वर्ष के बजट में भारतीय नागरिकों के मालिकाना हक में आने वाली विदेशी इकाइयां, जो अब तक कर के दायरे में नहीं लाई गई हैं, के लाभ पर भी सीएफसी विधान में जल्द कर के दायरे में लाने की बात की गई थी, जिसमें उस पर 15 प्रतिशत की स्थायी दर से टैक्स (देश के हक में) लगाया जाना था। पीओईएम विदेशी कंपनियों पर एक सख्त रेजिडेंस टेस्ट लागू करेगा और उसके बाद भारतीय स्रोतों से होने वाली आय पर कर प्राप्ति जारी की जाएगी।

इस सबका अर्थ है कर प्राप्ति में बढ़ोतरी और मुझे ये सब प्रावधान बजट में आते हुए दिख रहे हैं। यह सारे प्रावधान हमारे यहां अपनाए जा सकते हैं। डर केवल इनके प्रशासनिक तंत्र को लेकर है। उद्योग जगत ऐसे प्रावधानों के अस्थायी और एकतरफा अमलीकरण और कमजोर सुरक्षा मानकों से खौफजदा है। हालांकि दूसरे डीटीसी ड्राफ्ट में ऐसी भावनाओं के तुष्टिकरण का प्रयास किया गया है और डीटीसी की स्टैंडिंग कमेटी ने इस संदर्भ में कुछ जरूरी सलाहें भी दी हैं। तो टैक्स एवॉयडेंस की जिम्मेदारी प्रशासन पर आती है, न कि करदेयता पर और क्षेत्रीय कानूनों की बजाय अंतरराष्ट्रीय मानकों पर संधि प्रावधान बनेंगे। इसलिए जल्दबाजी में बनाया गया कानून न केवल औद्योगिक संवेदनाओं को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि कानूनी बहस भी शुरू करेगा।

ट्रांसफर प्राइसिंग विवादों पर नजर
हालांकि सीमा पार लेन-देन में ट्रांसफर पैकिंग के संबंध में एडवांस प्राइसिंग एग्रीमेंट (एपीए) भी डीटीसी के एजेंडे में शामिल था और ऐसा लगता भी है कि सरकार इस महत्वपूर्ण प्रावधान की दिशा तेज करने में रुचि भी ले रही है। एपीए संबंधित सरकारी कमेटी ने तरक्की भी की है और अनेक विदेशी शक्ति केंद्रों और ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) से श्रेष्ठतम सेवाओं को अपनाने के संबंध में बात की है, जिससे उसके दोतरफा एपीए चलन अमल में लाए जाने की दृढ़ता का पता चलता है। इससे देश एवं विदेशी क्षेत्रों में करदाताओं को मिलने वाली निश्चितता का पता चलता है। प्लान पैनल ने एपीए अथॉरिटी की स्वायत्तता पर सिफारिशें दी हैं और छोटे व्यवसायों को अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के न्यूनतम मूल्य की कठिन शतरें से दूर रखने संबंधी बात की है।

आमदनी घोषणा संबंधित त्वरित या योजनाबद्घ नीति
विदेशी बैंकों में अवैध आय पर पहरे जैसी भावनाओं को देखते हुए हमें कुछ नए प्रशासनिक कदम उठते हुए देखने को मिल सकते हैं, जिससे बाहरी संपत्तियों जैसे स्रोतों से कर क्षेत्र में वृद्घि हो सकती है। पिछले टैक्स मामलों को मौजूदा छह वर्ष से बढ़ा कर दस वर्ष करने की समय सीमा भी इस दिशा में देखी जा सकती है। मुझे वॉलियंटरी डिस्क्लोजर स्कीम की घोषणा होती नहीं दिखती, क्योंकि ब्लैक मनी पैनल को 31 मार्च तक अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है।

इस पैनल में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस, द डायरेक्टरेट ऑफ रिवेन्यू इंटेलिजेंस, द एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट, द फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट और विधि मंत्रालय के अधिकारियों की इसके विचारों पर एकमतता बननी शेष है। इसके अलावा, सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार एक सेवानिवृत सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष जांच कमेटी बनाने के दिशा-निर्देश पर भी अभी कार्य करना है। साथ ही, भारत ग्लोबल ट्रांसपेरेंसी फोरम का हिमायती है और कर सूचना समझौते से जुड़े एवं अन्य सहयोगियों के साथ विशेष भूमिका निभा रहा है। इस दिशा में प्रगति की गति कुछ धीमी है, क्योंकि वित्त मंत्रालय की नजर एक दीर्घकालिक नीति पर है। लिहाजा इसे बजट समय की ही सुधार प्रक्रिया कहना गलत होगा।
(लेखक बीएमआर एडवाइजर्स के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।)

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