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कब तक दौड़ेगी घाटे की रेल

साल 2012-13 का रेल बजट ‘विश लिस्ट’ से अधिक कुछ भी नहीं है। बातें इसमें बड़ी-बड़ी हुईं, पर योजनाएं कैसे पूरी होंगी, इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने अगले पांच वर्षों के अपने लक्ष्य को सदन में रखा, परंतु पहले साल में ही इसके पूरे होने के आसार नहीं हैं। वित्तीय सत्र 2012-13 के लिए साठ हजार करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं, जबकि 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए कुल 2.50 लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय मदद लेने का प्रस्ताव है।

अगर 60 हजार करोड़ रुपये को पांच से गुणा करें, तो यह रकम कुल सरकारी मदद से ज्यादा हो जाएगी। कुल आबंटित बजट के 24,000 हजार करोड़ रुपये सकल बजटीय सहायता के रूप में होंगे। दो हजार करोड़ रुपये रेलवे सुरक्षा कोष व 18,050 करोड़ आंतरिक संग्रहण के माध्यम से होंगे। ऐसे में देखें, तो पहले साल से ही रेलवे की सुरक्षा, आधुनिकीकरण, बुनियादी ढांचे व मानवरहित फाटक हटाने संबंधी कामकाज अधूरे रह सकते हैं। इस  लिहाज से हम कह सकते हैं कि बजट का ब्लू प्रिंट जितना बेहतर दिखा, उतनी तैयारी वाकई हुई नहीं थी।

रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी अपने बजटीय भाषण के दौरान ममता के विजन-2020, काकोदकर समिति की सुरक्षा संबंधी सिफारिशों और रेलवे के आधुनिकीकरण पर सैम पित्रोदा की रिपोर्ट के बीच संतुलन साधते दिखे। उन्होंने कहा कि पटरियों पर हादसे न हों, यही हमारा लक्ष्य है और इसके बाद वह काकोदकर समिति की सिफारिशों को मानने की बात करने लगे। लेकिन उन्होंने सिर्फ संगठन बनाने का प्रस्ताव ही रखा। आखिर रेलवे सुरक्षा प्राधिकरण बना देने भर से क्या होगा?

काकोदकर समिति का यह भी कहना था कि पुरानी पटरियों पर अधिक बोझ न डाले जाएं। परंतु सरकार ने तो इस ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया। न तो इन पटरियों पर चलने वाली रेलगाड़ियों में कमी की गई है और न ही उनके फेरे घटाए गए हैं। इससे उलट 75 नई एक्सप्रेस और 25 पैसेंजर ट्रेनों को बढ़ाने का एलान किया गया है। इनमें से कुछ एक्सप्रेस ट्रेनें तो उन पटरियों पर ही दौड़ेंगी, जहां दुर्घटनाएं होने की आशंका सबसे ज्यादा है। अगले पांच साल में मानव रहित फाटकों को खत्म करने का प्रस्ताव है। बेशक यह फैसला काबिल-ए-तारीफ है। फिर भी यह देखना जरूरी होगा कि सरकार अपने इस लक्ष्य को कब तक पूरा कर पाती है?

यह भी गौर करने की बात है कि हम अपने आर्थिक विकास के लक्ष्य से काफी दूर हैं। हम क्या, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में मंदी के बादल घुमड़ रहे हैं। भारतीय रेलवे भी इससे अछूती नहीं है। खुद रेल मंत्री अपने भाषण में बार-बार रेलवे की माली हालत खराब होने की बात करते रहे। दरअसल, उन्हें अपने पूर्ववर्ती मंत्रियों के फैसलों की कीमत भी चुकानी पड़ रही है। पिछले आठ साल से रेल किराये में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई थी। पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी की नजर राइटर्स बिल्डिंग पर थी। उनसे पहले लालू प्रसाद रेल मंत्री थे और उनकी नजर बिहार की गद्दी पर थी। अब ऐसे में एकाएक रेलवे की आमदनी कैसे बढ़ेगी, यह दिनेश त्रिवेदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी।

इसमें एक बात तो तय है कि जब तक दूसरे कारोबारी क्षेत्रों में आर्थिक वृद्धि नहीं होगी, भारतीय रेलवे भी लाभ की स्थिति में नहीं पहुंच पाएगी। यहां तक कि यात्री किराया और माल भाड़ा बढ़ाने से भी कुछ नहीं होने-जाने को है। हालांकि यात्राियों का किराया बढ़ना रेलवे के लिए एक शुभ संकेत है। प्रति किलोमीटर के हिसाब से देखें, तो कोई ज्यादा किराया नहीं बढ़ा है। दिल्ली से कोलकाता के यात्री किराये में लगभग 30 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इसकी अपेक्षा वातानुकूलित सफर को महंगा किया गया है।

परंतु यह समझना होगा कि वातानुकूलित वर्ग में वही सफर करते हैं, जिनकी आमदनी मोटी है। ताज्जुब यह है कि रेलवे अपने लक्ष्य से 20,000 कम मुसाफिरों को ढो रहा है। अब मुसाफिरों को बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। पर यह लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है, जब ई-टिकटिंग व रेलवे बुकिंग काउंटर को और सुलभ किया जाए, पर इस तरफ कोई कवायद नहीं हुई।

रेलवे अपनी आमदनी के लिए सबसे ज्यादा माल ढुलाई पर निर्भर है। और आमदनी कमाने के चक्कर में इस बार माल भाड़े में जबर्दस्त वृद्धि की गई है। इसका उलटा असर पड़ेगा। पहले की तुलना में माल ढुलाई और कम होगी। पिछले साल करीब 20-25 मिलियन टन कम माल की ढुलाई हुई थी। अब इस बार इस लक्ष्य में 55 मिलियन टन की बढ़ोतरी की गई है, जबकि आर्थिक हालात इतने बेहतर नहीं हैं कि माल ढुलाई रातोंरात बढ़ जाए। बाकी क्षेत्रों की प्रगति को देखें, तो कोल इंडिया की हालत इतनी अच्छी नहीं है। ऐसे में कोयले की ढुलाई में कमी ही आएगी। सीमेंट की ढुलाई आधारभूत संरचनाओं के निर्माण से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। और हम देख रहे हैं कि रियल इस्टेट और आधारभूत निर्माण क्षेत्र में मंदी छाई हुई है। अन्य निर्यात में भी कमी दर्ज की गई है। इसलिए माल भाड़े को बढ़ाने का रेल मंत्री ने काफी गलत फैसला किया है।

घाटे और वायदे की इस रेल को इस बार संभाला जा सकता था, अगर नए संगठनों को बनाने की पहल न होती तो। आखिर किस सेक्टर का संगठनों से भला हुआ है? जबकि इस बार रेलवे में कई संगठनों को बनाने का प्रस्ताव किया गया है। सुरक्षा के लिए स्वायत्त रेलवे सुरक्षा प्राधिकरण, विकास के लिए रेलवे रिसर्च ऐड डेवलपमेंट कौंसिल, रेलवे स्टेशनों को आधुनिक बनाने के लिए कमेटी, सफाई के लिए अलग हाउसकीपिंग बॉडी,  वगैरह-वगैरह। हर जगह संस्था, इससे क्या फायदा होगा? पहले से ही इंडियन रेलवे डेवलपमेंट अथॉरिटी इन कामों को संभाल रही है। इस संस्था के अधिकारों और बजट को बढ़ाया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

भारतीय रेलवे बोर्ड में पहले पांच सदस्य होते थे, अब इसमें दो सदस्यों की बढ़ोतरी का प्रस्ताव है। इससे तो तंत्र में और जटिलता आएगी। जहां तक कमर्शियल डेवलपमेंट का मुद्दा है, तो इस क्षेत्र की भी अनदेखी की गई है। माना कि आप नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को वाणिज्यिक तौर पर जीवित नहीं कर सकते, क्योंकि पास में कनॉट प्लेस जैसे इलाके हैं। परंतु दूर-दराज के इलाकों में तो वाणिज्यिक गतिविधियां बढ़ाई जा सकती हैं। बस पब्लिक-प्राइवेट पाटर्नरशिप बना देने भर से काम नहीं चलने वाला है। अब रेलवे को एक ठोस और दूरगामी नीति चाहिए, जो इस बार के बजट में कतई नहीं है।
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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