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राजनीतिक दबावों के बीच तलाशी गुंजाइश

संभावनाएं बहुत सीमित हैं, रेलवे के पास पांव फैलाने के लिए बहुत ज्यादा जगह है नहीं। इसे ध्यान में रखें, तो लगेगा कि रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने उपलब्ध संसाधनों के लिहाज से एक अच्छा बजट पेश किया। हमें वास्तविकता को ध्यान में रखना ही होगा। रेलवे का बजट सिर्फ संसाधनों से और कारोबार से नहीं जुड़ा। इसमें सबसे बड़ी भूमिका राजनीति भी निभाती है। रेल बजट की बहुत सारी नीतियां इस राजनीति से तय होती कि बजट से सरकार की, या रेल मंत्री की जनता के बीच कौन सी छवि जाएगी। या फिर अगले आम चुनाव या विधानसभा चुनाव पर इसका क्या असर पड़ेगा। अगर इन दबावों को देखें, तो यह बजट ठीक-ठाक है। हम कहां हैं और कहां जाना चाहते हैं यह समझ इस बजट में दिखाई देती है।

पिछले कुछ रेल बजट से अगर हम इस बजट की तुलना करें, तो कुछ नई बातें दिखाई देती हैं। मसलन इस बार रेल मंत्री ने किराया बढ़ाने की कोशिश की। वर्ना पिछले काफी समय से रेल किराये को छूना पाप की तरह बन गया था। चाहे मुद्रास्फीति बढ़ती रहे, ईंधन की कीमतें जितनी भी ऊंची हों और रेलवे का खर्च जितना भी बढ़े, आप यात्री किराये को छू नहीं सकते थे। यह सच है कि किराये में हुई यह बढ़ोतरी बहुत मामूली है, लेकिन कम से कम किसी ने इसे बढ़ाने की शुरुआत तो की। रेल मंत्री जिस पार्टी के हैं, उसकी सर्वेसर्वा ममता बनर्जी रेल किराया बढ़ाने की हर तरह से विरोधी रही हैं। रेल मंत्री ने किराया बढ़ाकर उनकी नाराजगी भी मोल ली।

रेल बजट में हमें यह भी बताया गया कि रेलवे ने 80-85 हजार नई भर्तियां की हैं, और मंशा एक लाख भर्तियां करने की है। इसी के साथ हम यह भी सुनते रहते हैं कि रेलवे में चार लाख अतिरिक्त कर्मचारी हैं। तकनीक, सुरक्षा और कई कारणों से नई भर्तियां तो करनी ही पड़ती हैं, इस पर एतराज नहीं है, लेकिन अतिरिक्त कर्मचारियों से मुक्ति पर भी तो कोई बात हो।

रेल मंत्री ने बताया कि उनके बजट में 820 नई चीजें शुरू करने की घोषणाएं हैं। ज्यादा अच्छा रहता कि इसकी जगह वे यह बताते कि पिछले बजट में जो घोषणाएं हुई थीं, उनमें से कितनी लागू हुईं और कितनी अधूरी पड़ी रह गईं। ऐसी ज्यादातर घोषणाएं लागू ही नहीं होतीं। हर बजट में ऐसी कई घोषणाओं को बार-बार दोहराया जाता है। आखिर क्या वजह है कि हर साल बजट में डेडीकेटेड फ्रेट कैरिडोर बनाने की बात होती है।

रेलवे के कारोबार को पटरी पर लाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि लोक लुभावन रेल बजट पेश करने की परंपरा को ही सिरे से खत्म कर दिया जाए। संसद में सिर्फ आमदनी और खर्च का लेखा-जोखा पेश हो। रेलवे के विस्तार या किराया-भाड़ा बढ़ाने-घटाने के लिए संसद के पास जाने की जरूरत ही नहीं है, भारतीय रेलवे ऐक्ट भी इसकी इजाजत देता ही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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