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शासन-प्रशासन का भूला-बिसरा स्वर्ण युग

लोकतंत्र में मेरा अथाह विश्वास है, लेकिन कभी-कभी यह भी सोचता हूं कि पुराना सिस्टम भी इतना बुरा न था। पुराने वक्त में चुनाव नहीं होते थे, राजा बाकायदा युद्ध लड़कर सत्ता पाते थे या खोते थे। जो राजा हार जाता था, विजेता राजा उसका सिर कटवा देता था या कृपालु हुआ, तो उसे अंधा करके जेल में बंद कर देता था।

मुगलों में आपसी भाईचारा बहुत था, इसलिए जो बादशाह बनता, वह कभी-कभी अपने भाइयों के साथ दूसरा तरीका अपनाता, हालांकि पहला तरीका ज्यादा लोकप्रिय था। इससे राजनीति में भाई-भतीजावाद पनपने की आशंका खत्म हो जाती थी, क्योंकि तख्त पर बैठा शख्स सबसे पहले अपने सारे भाइयों, भतीजों बल्कि लगभग सभी पुरुष रिश्तेदारों को मार देता था।

गद्दी हथियाने पर अपने विरोधी को मार डालने का एक और फायदा यह होता था कि राजा का पैसा बचता था, हारे हुए शासक को सरकारी बंगला, जेड श्रेणी की सुरक्षा वगैरह नहीं देनी पड़ती थी। जो पैसा बचता था, उसे महल बनाने, अंत:पुर या हरम की जनसंख्या बढ़ाने जैसे जनकल्याणकारी कार्यों में लगाया जाता था।

उस जमाने में अगर राजा जनता के पैसे से स्मारक, बाग-बगीचे बनवाए, तो उसे भ्रष्टाचार नहीं कहते थे। शाहजहां ने ताजमहल बनवाया, तो उसे किसी ने भ्रष्टाचार नहीं कहा। ऐसी इमारतें पीपीपी या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की आदर्श नजीर हैं, पैसा पब्लिक का, काम प्राइवेट यानी बादशाह का है। होता आज भी यही है, लेकिन इसे भ्रष्टाचार कहकर लोग चुनाव में हरवा देते हैं।

तब किसी शासक के हटने के लिए पांच साल इंतजार नहीं करना पड़ता था, कभी भी हटाया जा सकता था। कभी-कभी तो इतनी तेजी से एक के बाद दूसरे शासक आते थे कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीय क्रिकेट टीम की बल्लेबाजी का भ्रम होता था। फिर चूंकि रिवाज हारे हुओं को मारने का था, इसलिए राजनीति की सफाई लगे हाथ होती रहती थी, शोर नहीं मचाना पड़ता था कि चुनाव सुधारों को लागू करो। मैं पांच राज्यों के चुनाव परिणामों पर दरअसल लिखना चाहता था, लेकिन यह सब क्यों लिख गया, पता नहीं।
राजेन्द्र धोड़पकर

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