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तोल मोल के बोल

वह बड़बोले हैं और अक्सर लोगों को धुआंधार शब्दों से प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन वह जितना बोलते हैं, उतने ही साधारण नजर आते हैं। जब से ग्लोबलाइजेशन हुआ, हमने अधिक बोलने को भी एक हथियार समझा। बोलते जाने को बाजार अहमियत देता है। इससे आर्थिक समृद्धि तो बढ़ी, लेकिन हमारी असाधारणता घटती गई।

नाटककार और मोटिवेटर रॉबर्ट ग्रीन ने ‘शब्दों की शक्ति’ पर विस्तृत अध्ययन किया है। रॉबर्ट बताते हैं कि इंसान विश्लेषण और स्पष्टीकरण करने वाली मशीन है। हम हमेशा यह जानने की कोशिश में रहते हैं कि सामने वाला क्या सोच रहा है। ऐसे में, जब सामने वाला कम बोले या चुप रहे, तो उसकी मंशा और इरादे समझ में नहीं आते और यह बात उसके पक्ष में जाती है। दरअसल कम बोलने से कभी-कभार ही अफसोस वाली स्थिति बनती है, जबकि अधिक बोलने से बार-बार।

रॉबर्ट के अध्ययन में कुछ नया नहीं है। ईसा से तीसरी सदी पूर्व चीन के दार्शनिक हान फेई त्सु ने कहा था, ‘अधीनस्थों के बोलने से पहले कभी अपने होंठ न हिलाएं। अगर सम्राट रहस्यमय न हो, तो मंत्रियों की चांदी हो जाएगी।’ उनकी बात रणनीति से जुड़ी है, लेकिन आम जीवन में भी इसे उतारा जाना आवश्यक है। नए मनोचिकित्सकीय शोध बताते हैं कि चुप्पी से बड़ी मात्र में जैव उर्जा निर्मित व एकत्रित होती है। इस चुंबकीय ऊर्जा के उपयोग से शरीर के विकार, बेचैनी, घाव आदि कुदरती रूप से ठीक हो सकते हैं।

इधर, कार्यक्षमता बढ़ाने में कम बोलने की भूमिका पर प्रयोग भी हो रहे हैं। बर्कले यूनिवर्सिटी ने प्रयोग के शुरुआती चरण में पाया कि कम बोलने से आंखें, चेहरा व पूरा शरीर शांत हो जाता है। ऐसी स्थिति में हमारी कार्यशीलता बढ़ जाती है। हम चीजों पर ध्यान अधिक केंद्रित कर पाते हैं। साफ है, कम बोलना आत्मानुशासन ही नहीं, तरक्की का भी रास्ता है।
प्रवीण कुमार

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