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दिल्ली मेट्रो, मुंबई लोकल

मैं उस पूरे दिन मुंबई लोकल में घूमता रहा। कुल मिलाकर डेढ़ सौ किलोमीटर से भी ज्यादा सफर कर डाला उस दिन मैंने लोकल में। हालांकि रविवार था और इस दिन भीड़ ज्यादा नहीं होती, फिर भी लोकल है, खाली तो चलेगी नहीं। आखिर मुंबई की लाइफ-लाइन है। मैं तुलना कर रहा था दिल्ली और मुंबई की। दिल्ली आने के बाद मुङो निर्माणाधीन मुंबई मेट्रो के कुछ इंजीनियर मिले। मैंने उनसे पूछा कि बताओ, तुम लोग लोकल को टक्कर दे सकते हो? वे बोले, नहीं। मुंबई में कोई चीज लोकल को टक्कर देने की हालत में नहीं है।

फिर मैंने बताया कि हमने यानी दिल्ली मेट्रो ने तो दिल्ली में हर चीज को टक्कर दी है। ईएमयू हो या डीटीसी, मेट्रो आने के बाद सब ‘बेरोजगार’ से हो गए हैं। वे बोले कि दिल्ली अलग है, जबकि मुंबई की हालत अलग है। मैंने कहा कि जब दिल्ली में मेट्रो शुरू हुई थी, तब सब यही कहते थे कि यह किसी को टक्कर नहीं दे पाएगी। आज आलम यह है कि कई रूटों पर डीटीसी की बसें बंद कर दी गई हैं। लोकल ईएमयू सेवाएं बिल्कुल खाली चलती हैं। ले-देकर गाजियाबाद, पलवल और पानीपत रूट वाली ईएमयू ही सुबह-शाम भरकर चलती हैं।

बहरहाल, मैंने मुंबई वाले इंजीनियरों से पूछा कि बताओ, दिल्ली में मन लग रहा है कि नहीं। वे बोले, नहीं। क्यों? यहां भीड़ ही नहीं है, सब तरफ खालीपन दिखाई दे रहा है। तो ये हालत है मुंबईकरों की। दिल्ली की भीड़ से हम तंग हैं और वे कह रहे हैं कि यहां भीड़ ही नहीं है।
मुसाफिर हूं यारों में नीरज जाट

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