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यथार्थ की पटरी पर

रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने जो रेल बजट पेश किया है, वह काफी बुलंद इरादों वाला है। इस रेल बजट में खास बात यह है कि उन्होंने इसे माना है कि रेलवे में बुलंद इरादों और योजनाओं की कमी नहीं है, लेकिन उनके कार्यान्वयन के मामले के रिकॉर्ड उतना ऊंचा नहीं है। इसके लिए उन्होंने पेशेवर विशेषज्ञता और व्यावहारिकता पर जोर दिया है। मुद्दा फिर भी यही है कि इससे इसमें राजनीतिक अड़चनें आ सकती हैं। ये अड़चनें रेल बजट के पेश होने के तुरंत बाद शुरू हो गई हैं और शुरुआत दिनेश त्रिवेदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने ही की है।

तृणमूल की आपत्ति रेल किराये बढ़ाने पर है। लोगों को शायद याद भी न हो कि पिछली बार रेल किराये कब बढ़े थे। एक के बाद एक रेल मंत्रियों ने रेल किराये न बढ़ाने को ऐसा संवेदनशील लोकप्रिय मुद्दा बना दिया है कि किसी भी रेल मंत्री के लिए किराये बढ़ाने का प्रस्ताव रखना बारूदी सुरंग पर पैर रखने जैसा है। दिनेश त्रिवेदी ने यह साहस किया है यह प्रशंसनीय है, लेकिन क्या वे इस प्रस्ताव पर कायम रह पाते हैं, यह देखना है। रेल मंत्री ऐसी व्यवस्था भी बनाना चाहते हैं कि ईंधन के दामों में बढ़ोतरी के साथ रेल किराये में भी समायोजन हो सके।

समस्या यह है कि रेलवे की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है और रेल मंत्री का ही यह कहना है कि रेलवे की स्थिति न सुधारी गई, तो उसकी स्थिति इंडियन एयरलाइंस की तरह हो सकती है। अगर ऐसा होता है, तो भारतीय रेलवे देश की अर्थव्यवस्था पर इंडियन एयरलाइंस से कई गुना बड़ा बोझ बन जाएगी। संसाधनों की कमी का सबसे बड़ा असर यात्रियों को मिलने वाली सुविधाओं और उससे भी ज्यादा सुरक्षा पर पड़ता है। सुरक्षा पर भारतीय रेलवे जरूरत से बहुत कम खर्च करती है और इसका नतीजा रेल दुर्घटनाओं के रूप में देखने में आता है।

रेलवे की स्थिति सुधारने के लिए जो कमेटियां गठित की गई थीं, उनकी सिफारिशों पर अमल करना भी इसलिए मुश्किल है, क्योंकि उतना पैसा रेलवे नहीं खर्च कर सकती। लेकिन दिनेश त्रिवेदी ने अपने बजट में सुरक्षा का महत्व रेखांकित किया, वरना अक्सर रेल मंत्रियों को सुरक्षा की याद दुर्घटनाएं घटने के बाद ही आती है।

दिनेश त्रिवेदी ने रेलवे की आय बढ़ाने के लिए जो कदम सुझाए हैं, उनके साथ भी समस्या व्यावहारिकता की है। सार्वजनिक और निजी भागीदारी, रेलवे की जमीन का इस्तेमाल, खर्च कम करने के उपाय वगैरह पर चर्चा बरसों से होती आ रही है, लेकिन अब तक तो इनसे बहुत फायदा होता हुआ नहीं दिखा।

माल ढुलाई में रेलवे की भागीदारी बढ़ाने की चर्चा भी हर बजट में होती है। माल ढुलाई के लिए रेलवे, सड़क यातायात के मुकाबले बेहतर माध्यम है, लेकिन इस पर ध्यान कभी नहीं दिया जाता और आज भी ट्रकों से ढुलाई ज्यादा होती है। रेल मंत्री ने भी जो बात स्वीकार की है कि कमी व्यावहारिक स्तर पर अमल की है। वक्त के साथ आगे बढ़ने के लिए रेलवे को टेक्नोलॉजी और प्रबंधन के स्तर पर अपने को बेहतर बनाते जाना होगा।

भारतीय रेलवे के पास कौशल और विशेषज्ञता की कमी नहीं है, उससे विश्व स्तर की उम्मीद करना गलत नहीं है। यह दिल्ली मेट्रो के उदाहरण से स्पष्ट है, जिसे भारतीय रेलवे के अनुभवी विशेषज्ञों ने ही बनाया। लेकिन इसके लिए राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति बहुत जरूरी है। इक्कीसवीं शताब्दी में भारतीय रेलवे उन्नीसवीं शताब्दी के तरीकों से नहीं चल सकती। उसे इक्कीसवीं शताब्दी में लाने के लिए उसके प्रबंधन के तौर-तरीके बदलने होंगे। दिनेश त्रिवेदी ने अपने बजट में ये संकेत तो दिए हैं, लेकिन फिर मुद्दा उनके अमल का है।

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