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सत्ता का अहंकार

बीते सोमवार को हमने न सिर्फ सरकारी अमले का बेशर्म व खुल्लम-खुल्ला दुरुपयोग देखा, बल्कि हुकूमत में बैठी पार्टी अवामी लीग के कारकूनों की बेजा कारस्तानियां भी देखीं, जिनका एकमात्र मकसद बीएनपी की रैली को हर हाल में नाकाम करना था। इसके लिए पार्टी के कैडर अवाम को खौफजदा करना चाहते थे। न केवल रैपिड एक्शन बटालियन व पुलिस के जवान, बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ता भी लोगों को रैली में शिरकत करने से रोकने की कवायद में जुटे देखे गए। यह वाकई हैरान कर देने वाला मंजर था कि सरकारी ताकत से लैस पार्टी के लड़ाके अपने सियासी विरोधियों को परेशान व बेइज्जत कर रहे थे।

अपनी तथाकथित ताकत दिखाने की कोशिश में पूरे मुल्क में अघोषित हड़ताल की स्थिति पैदा करके तथा राजधानी की घेराबंदी करके अवामी लीग ने दरअसल अपनी कमजोरी को ही उजागर किया है। क्या हमें हुकूमत से यह नहीं पूछना चाहिए कि आखिर सड़कों से पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बसें व गाड़ियां क्यों गायब थीं? आम तौर पर विपक्ष द्वारा बुलाई गई हड़ताल के दिन तो ये गाड़ियां पुलिस की हिफाजत में चलाई जाती हैं, ताकि यह दावा किया जा सके कि विपक्षी हड़ताल बेअसर रही। जब सरकार ही हड़ताल बुलाए, तो फिर अवाम के पास करने को बच क्या जाता है?

हम बेहद सख्ती के साथ सरकार के इस रवैये की मुखालफत करते हैं कि वह बीएनपी के वाजिब सियासी हक को कुचलने के लिए किसी भी हद तक जाने पर आमादा है। हम इस बात की भी पुरजोर मजम्मत करते हैं कि मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपना काम करने देने से रोका गया। कहने की दरकार नहीं कि जिस तरह से इस मसले से निपटा गया, वह अवामी लीग की दूरदर्शिता पर सवालिया निशान लगाता है। अफसोस की बात यह है कि जो पार्टी तीन साल पहले जबर्दस्त बहुमत के साथ हुकूमत में आई थी, वह आज वैधानिक विपक्ष को सभा व रैलियां करने से रोक रही है। अवामी लीग हुकूमत के इस तेवर से खुद इस पार्टी की साख को ही बट्टा लग रहा है, क्योंकि जम्हूरियत और अवाम के हक के लिए संघर्ष का उसका लंबा इतिहास रहा है।
द डेली स्टार, बांग्लादेश

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