DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ईमानदारी की राह में रुकावटें

मध्य प्रदेश में युवा आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की जघन्य हत्या नेताओं, पुलिसकर्मियों व नौकरशाहों के साथ अपराधियों की साठगांठ को एक बार फिर से उजागर करती है। जाहिर है, इस हत्या के तार गैरकानूनी कारोबार से जुड़े हुए हैं और ऐसे धंधे नौकरशाहों के वरदहस्त के बिना मुमकिन नहीं। पुलिस-प्रशासन व्यवस्था में एक तरह का कानून है कि अगर किसी संगठित क्षेत्र में गैरकानूनी धंधे चल रहे हैं, तो वे तब तक फल-फूल नहीं सकते, जब तक कि पुलिस व दूसरे शक्तिशाली लोगों की रजामंदी न हो। इसलिए इन दिनों ऐसे गैरकानूनी धंधे संगठित हुए हैं, इनकी जड़ें गहरी हुई हैं और फैली भी हैं। तभी तो इनके कामकाज सरेआम चल रहे हैं। जब तक कि अधिकारियों को पैसे नहीं खिलाए जाते, तब तक ऐसे कारोबार न तो चल सकते हैं और न ही फल-फूल सकते हैं। बहरहाल, इस तरह के गैर-कानूनी कारोबार की सूची अंतहीन है।

ये गैर-कानूनी धंधे कैसे चलते हैं? दरअसल, इसमें आपसी सहमति की परिपाटी है। जब पुलिस व दृूसरी संवैधानिक संस्थाओं के साथ अपराधियों की साठगांठ होती है, तो इस ‘कमांड ऑफ चेन’ से जुड़े सभी लोग गैरकानूनी गतिविधियों के दौरान अपनी आंखें मूंद लेते हैं, चाहे वे शीर्ष अधिकारी हों या कनिष्ठ। बड़े मामलों में, जहां ज्यादा दांव लगे होते हैं, वहां मंत्रियों से लेकर नीचे तक पैसे बांटे जाते हैं। हालांकि छोटे मामलों में मध्यम स्तर के कर्मचारियों की भूमिका बढ़ जाती है और पैसे का बंटवारा इनसे लेकर नीचे तक होता है। लेकिन छोटे खेलों में भी रिश्वत से हुई कमाई का एक हिस्सा नेताओं तक पहुंचता है। उन तक पैसा या तो नियमित अंतराल पर पहुंचता है या नियुक्तियों व तबादलों के लिए अग्रिम भुगतान के तौर पर। ऐसे धंधों में संगठित अपराधियों के साथ गठजोड़ रहता है।

यानी संगठित अपराधियों का पूरा तंत्र जब काम करने लगे और सब जगह पैसे पहुंच गए हों, तब उन्हें काम करने की पूरी आजादी दी जाती है। यहां तक कि अधिकारी भी खुलकर इस धंधे में उतर जाते हैं, क्योंकि उनमें डर की भावना खत्म हो जाती है। पुलिस व अपराधियों की मिलीभगत में गारंटी के नियम को लागू किया जाता है। अपराधियों को खुली छूट रहती है कि वे जिस तरह से चाहें, अपने धंधे चला सकते हैं। यह पक्का किया जाता है कि कोई उनकी राह में बाधक न बने। अगर सचमुच में किसी तरह की कोई अड़चन आती है, चाहे वह लोगों का दबाव हो या मीडिया अभियान, कानूनी मामला हो या एक ईमानदार अधिकारी की कार्रवाई, तो आखिरी वक्त तक अपराधियों के हितों को संरक्षित किया जाता है। एक बार जैसे ही गैर-कानूनी कारोबार को अंतिम रूप मिलता है, इससे जुड़े सभी लोगों व संस्थाओं को पैसे पहुंचा दिए जाते हैं और इस तरह से अवैध कारोबार का खेल शुरू हो जाता है। जब तक चेन ऑफ कमांड में शामिल सभी लोगों तक धन पहुंचते रहते हैं, तब तक सब कुछ ढर्रे पर रहता है।

लेकिन सभी लोग भ्रष्ट नहीं होते। यह कुदरत का कानून है। हर दौर में ऐसे लोग होते हैं, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं और इसके आधार पर कार्रवाई करते हैं। जब भी ऐसा होता है, अपराधियों और नौकरशाहों के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे गैर-कानूनी धंधे ठप पड़ने लगते हैं। ऐसे में उनके पास यही रास्ता बचता है कि ईमानदार अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाओ।

पुलिस अधिकारियों को रास्ते से हटाने के कई तरीके हैं। सबसे पहला यह कि कमाऊ जगहों पर उन्हीं अधिकारियों को तैनात किया जाए, जो भ्रष्ट हों। यह भी इसलिए होता है, क्योंकि ऐसे पद बिके होते हैं और भ्रष्ट लोग इन पदों को खरीदने की होड़ में शामिल रहते हैं। पद को खरीदने के बाद अधिकारी भ्रष्टाचार के बड़े खेल में संलिप्त हो जाते हैं, क्योंकि इन्हें अपना पैसा निकालना होता है। दूसरा तरीका यह है कि अगर यह अपरिहार्य हो कि किसी भ्रष्ट तंत्र में एक ईमानदार अधिकारी की तैनाती की जाए, तो ऐसे अधिकारी को रखा जाता है, जो नरमदिल हो। हम इन्हें धृतराष्ट्र टाइप अधिकारी कहते हैं।

हालांकि ऐसे अधिकारी खुद तो ईमानदार होते हैं, परंतु वे भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पाते। वे माफिया और माफिया को मदद पहुंचाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते। इस लिहाज से ईमानदार अधिकारी व भ्रष्ट, दोनों के लिए यह सुविधाजनक मामला है। तीसरा तरीका यह है कि ईमानदार अधिकारियों का कहीं और तबादला कर दिया जाए। अगर ऐसे अफसर फिर भी अपना मुंह खोलते हैं, तो उनके खिलाफ मनगढ़ंत आरोप लगाकर जांच समितियों के जरिये चुप कराया जाता है। एक तरीका और भी है। ऐसे नौकरशाहों की सालाना निजी रिपोर्ट को खराब कर दिया जाए, ताकि इन्हें पदोन्नति नहीं मिल सके। वे बदनाम हो जाते हैं और मजबूर होकर इस पेशे को ही छोड़ देते हैं।

बहरहाल, अधिकतर मामलों में ईमानदार पुलिस अधिकारियों को विभागीय तरकीबों के जरिये शांत रखा जाता है। परंतु कुछ ऐसे दुर्लभ मामले भी हैं, जिनमें माफिया को कुछ ज्यादा ही भरोसा हो जाता है कि सब उनकी जेब में हैं। इन्हीं मामलों में पुलिस अधिकारियों पर हमले होते हैं। जैसा कि नौजवान आईपीएस नरेंद्र कुमार के साथ हुआ। यह इस तरह की पहली घटना नहीं है। इससे पहले महाराष्ट्र के जलगांव जिले के एडिशनल कलक्टर को तेल माफिया ने जिंदा जला दिया था।

नरेंद्र कुमार की हत्या यकीनन काफी जघन्य है, लेकिन वे घटनाएं भी कम त्रासद नहीं, जिनमें ईमानदार पुलिस अधिकारियों की हत्या शारीरिक हमले की बजाय व्यवस्था की चालाकियों से होती हैं। ऐसी हजारों घटनाएं हैं। नरेंद्र कुमार के परिजनों के प्रति अब सहानुभूति दर्शाने वाले कई लोग सामने आ रहे हैं। यह उचित भी है। परंतु एक ईमानदार अधिकारी को जब तंत्र प्रताड़ित करता है, तो उस वक्त उसके साथ कोई खड़ा नहीं होता। उसकी पूरी जिंदगी बेवजह के तबादलों व पदों की भेंट चढ़ जाती है। न तो अधिकार होता है और न ही शक्ति।

इस पूरी समस्या का हल आसान नहीं है। लेकिन शुरुआत दो तरह से की जा सकती है। पहली, अमेरिका की तरह ही भारत में भी एक कानून बनाया जाए, जिसके मुताबिक, ईमानदार अधिकारियों को प्रताड़ित करना दंडनीय अपराध हो। दूसरी, वक्त आ गया है कि नेताओं से पुलिस अधिकारियों व दूसरे नौकरशाहों के तबादले व पोस्टिंग के अधिकार ले लिए जाएं और इसे स्वायत्त संस्थाओं के हवाले कर दिया जाए। इनसे निदान भले ही न हो, पर समाधान की ओर हम बढ़ेंगे। यही वह समय है, जब हम इसकी शुरुआत कर सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ईमानदारी की राह में रुकावटें