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सरकारी योजनाओं से नहीं खत्म होगा कुपोषण

पिछले कुछ साल से हमारे देश में दो चीजें एक साथ हो रही हैं। एक तो देश की बढ़ती-अटकती विकास दर पर खुशी जाहिर करना और दूसरी, कुपोषण पर दुख व्यक्त करना। पिछले दिनों प्रधानमंत्री तक ने इस पर चिंता व्यक्त की थी। कुपोषण के मामले में तो हमने अफ्रीका व एशिया के बहुत से देशों को भी पीछे छोड़ दिया है। इस पैमाने पर पाकिस्तान और बांग्लादेश तक की स्थिति हमारे मुकाबले काफी अच्छी है। हर बार जब ऐसी खबरें आती हैं, तो कुपोषण को खत्म करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बननी शुरू हो जाती हैं। पर नतीजा कुछ नहीं निकलता, क्योंकि एक तो ये योजनाएं भ्रष्ट सरकारी तंत्र के हवाले होती हैं और फिर ये पोषण की भारतीय परंपराओं से अनजान होती हैं।

यह सच है कि कुपोषण का सबसे भयानक स्तर गरीबों, खासकर ग्रामीण गरीबों में दिखाई देता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि भारत के संपन्न वर्गो के सभी लोगों को उनकी जरूरत के हिसाब से पूरे पोषण तत्व मिल रहे हैं। यह प्रकृति का नियम है कि जो व्यक्ति जिस भी प्राकृतिक वातावरण में पैदा हुआ, उसके शरीर की आवश्यकताओं का रिश्ता वहां पर उपलब्ध भोजन, मिट्टी से सीधा जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए, अत्यधिक ऊंचाई पर मिलने वाले कुट्टू में उपलब्ध रूटीन तत्व सूर्य के विकिरण से शरीर की रक्षा करते हैं। गुजरात में भोजन में मीठा-नमकीन वहां की तेज गरमी से होने वाले निर्जलीकरण या डीहाइड्रेशन से शरीर को बचाता है, जो हम इस बीमारी में नमक-चीनी के घोल के रूप में लेते हैं। भारतीय परंपरा में भोजन वैज्ञानिक तत्वों पर आधारित शरीर की जरूरतों के अनुसार तय हुआ था। स्थानीय उत्पादों पर आधारित यह व्यवस्था बदल गई है।

ऐसा भी नहीं है कि कुपोषण की यह समस्या हमेशा से इसी तरह विकराल थी। गांवों की स्थिति पिछले चार-पांच दशकों से ही गंभीर बनी है। पहले वे सभी उत्पाद, जिन्हें हमने मोटे अनाजों की संज्ञा दी, स्थानीय परिस्थितियों में सबसे उपयुक्त फसलें थीं। इन अनाजों की सबसे बड़ी खासियत मात्र यही नहीं थी कि ये कम श्रम और निम्न आवश्यकताओं पर पैदा होते हैं, बल्कि इनमें अति महत्वपूर्ण खनिज, प्रोटीन, काबरेहाइड्रेट मौजूद हैं। मोटा अनाज गरीबों का भोजन है, संपन्न वर्ग के भोजन समङो जाने वाले धान और गेहूं ने मोटे अनाजों का खेतों से सफाया कर दिया। ग्रामीणों को पोषण करने वाले मंडुवा, चोलाई, कुट्टू, कोदों हमारी थाली से गायब हो गए।

एक सर्वेक्षण के अनुसार, पहले गांवों का 50 प्रतिशत भोजन मोटे अनाज के रूप में, 20 प्रतिशत गेहूं-धान, 10 प्रतिशत, सब्जी-दाल और 10 प्रतिशत वनों पर आधारित कंद-मूल फलों पर था। आज हमारे भोजन में 60 प्रतिशत गेहूं-धान,10 प्रतिशत मोटा अनाज, 20 प्रतिशत सब्जी-दाल है। कंद-मूल, फलों पर निर्भरता लगभग शून्य हो गई है। पर कुपोषण के कारण के रूप में अभी तक इसे मान्यता नहीं मिली।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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