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घर दही तो बाहर दही

बिहार की एक चर्चित कहावत है- ‘घर दही, तो बाहर दही।’ अर्थात जिसे घर में सुख मिलता है, उसे ही बाहर भी दही मिलता है। दही मिलने का मायने आदर से भी है। इसलिए व्यक्ति को पहला सम्मान मिलना भी घर से ही प्रारंभ होता है। जिस महिला को घर में सम्मान मिलता है, वही बाहर की दुनिया में भी सम्मान पाती है। पुरुषों के साथ भी ऐसा ही होता है। घर में सम्मान पाने के लिए आवश्यक है, घर के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन। स्वयं के लिए नहीं, दूसरों के लिए जीना। घर के अन्य सदस्यों की जरूरतें पूरी करने की कोशिश। फिर तो सम्मान मिलेगा ही मिलेगा। घर के सदस्यों के लिए स्वार्थरहित काम करके जहां व्यक्ति को स्वयं सुख मिलता है, वहीं घर के अन्य सदस्य भी उसे आदर-सम्मान देते हैं।

दरअसल, घर या बाहर अधिकार पाने के लिए कर्तव्य की लागत लगानी पड़ती है। इसके बिना पारिवारिक और सामाजिक अधिकार भी नहीं मिलते। कर्तव्य ही सिखाया जाता है। किसी का कर्तव्य ही दिखता है, जो व्यवहार में प्रकट होता है। अधिकार दिखता नहीं, केवल मांगा जाता है। जो लोग अधिकार की मांग किए बगैर कर्तव्य किए जाते हैं, उन्हें घर में भी सम्मान मिलता है। उन्हें मांगने की जरूरत नहीं पड़ती। यह भी निश्चित है कि सम्मान पाने का भी अभ्यास हो जाता है। जो घर में सम्मान पाता है, उसे बाहर भी सम्मान मिलता है।

इतनी बड़ी बात को गांव की एक कहावत में पिरो दिया गया है। इसे व्यक्ति के संस्कार में ढाला जाता रहा है। घर तो घर है। जहां संस्कार भी मिलता है और सम्मान भी। घर कितना भी छोटा क्यों न हो, हर सदस्य को उस घर को संवारना चाहिए। उसे सम्मानित करना चाहिए। इस प्रक्रिया में उसे स्वयं भी सम्मान मिलता है। इसीलिए घर से किसी शुभ कार्य के लिए निकलते समय दही खिलाया जाता है, ताकि बाहर भी दही मिले।
मृदुला सिन्हा

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