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नागार्जुन का रचना-संघर्ष

जन्मशताब्दी के अवसर पर बाबा नागार्जुन के रचना कर्म को कई-कई कोणों से देखा गया। सबने अपनी-अपनी निगाह से उन्हें देखा। जाहिर है, हमारी भी एक निगाह है।...संगठनात्मक तौर पर प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत 1936 में हुई। आज जब हम उस आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो उसी वर्ष बाबा की लिखी एक मशहूर कविता की याद आती है, जिसका शीर्षक है- उनको प्रणाम! बाबा उन्हें याद करते हैं, जो देश की आजादी और समाजवादी व्यवस्था के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए, जिनका ट्रैजिक अंत हुआ है, जो कठिन साधना व दुर्दम साहस के प्रतीक थे, जिनकी सेवाएं अतुलनीय थीं और जो किसी किस्म के विज्ञापन से दूर थे।

1931 में भगत सिंह को फांसी हुई थी और पांच वर्ष के बाद बाबा यह लिख रहे थे कि उनकी सेवाएं थीं अतुलनीय। पर उन्हें गहरी बेचैनी इस बात से है कि कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी यह दुनिया उनको भूल गई है। बाबा का साहित्य मानो इस भूल जाने के विरुद्ध एक अनवरत संघर्ष है। बाबा औरों की तरह श्रद्धा के साथ उन्हें याद करके, उनका गौरव गान करके उसी दुनिया के धंधे में रम नहीं जाते, जहां व्यवहार में शहीदों के सपनों से किनारा कर लिया जाता है और अनवरत समझौतों के बीच उन्हें महज पूजा की वस्तु बना दिया जाता है और उनके साथ बैठकर भी उन्हें याद करने से परहेज नहीं किया जाता, जो आज भी उनके सपनों की हत्या करने में लगे हैं। भगत सिंह की अर्धशती के समय बाबा ने जो कविता लिखी, उसमें यही क्षोभ है।
लेखक मंच में सुधीर सुमन

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