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सस्ते इलाज की उम्मीद

भारत के बौद्धिक संपदा महानियंत्रक ने एक भारतीय कंपनी को लीवर और गुर्दे के कैंसर की एक महत्वपूर्ण दवा बनाने की मंजूरी देकर एक ऐतिहासिक फैसला किया है। यह दवा जर्मन बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर ने पेटेंट कराई है और इसकी कीमत एक महीने के इलाज के लिए 2,84,000 रुपये बैठती है। अब नेटको नामक जिस भारतीय कंपनी को दवा बनाने की मंजूरी मिली है, वह भारत में यह दवा 8,880 रुपये में उपलब्ध करवाएगी और हर साल 600 जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त में दवा देगी। उसे नियमित रूप से अपने बिक्री के आंकड़े महानियंत्रक के दफ्तर में भेजने होंगे, ताकि यह पता चलता रहे कि वह कंपनी मुनाफाखोरी तो नहीं कर रही है।

यह कार्रवाई भारतीय पेटेंट ऐक्ट की धारा-84 के तहत की गई है, इस धारा के मुताबिक, सरकार किसी कंपनी को ऐसी दवा बनाने का अधिकार दे सकती है, जिसका पेटेंट किसी और के पास हो, जो भारतीय मरीजों के लिए जरूरी हो और उन्हें न मिल पा रही हो। भारत में इस धारा का पहली बार इस्तेमाल किया गया है, जबकि कई दूसरे विकासशील देशों ने कई बार ऐसे कानूनों के जरिये मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध करवाई हैं।

भारतीय दवा उद्योग और अंतरराष्ट्रीय दवा उद्योग का झगड़ा बहुत पुराना है। दरअसल लंबे वक्त तक भारतीय कानून किसी उत्पाद पर नहीं, उसे बनाने की प्रक्रिया पर पेटेंट को मान्यता देता रहा। इसके तहत अगर कोई पेटेंट वाली दवा किसी और प्रक्रिया से बनाई जाए, तो इसे पेटेंट का उल्लंघन नहीं माना जाता।

इस नियम से भारतीय दवा उद्योग ने तमाम दवाएं बनाईं और भारत ही नहीं, बल्कि दूसरे विकासशील देशों में भी पहुंचाई। अब भारतीय पेटेंट कानून में काफी फेर-बदल हो चुके हैं। नई दवाओं को बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि दवाओं के शोध में बहुत धन खर्च होता है और अगर उन्हें बेचने का एकाधिकार न हो, तो यह पैसा वसूल करना नामुमकिन है। बायर ने यही तर्क दिया, लेकिन महानियंत्रक ने उसे नहीं माना।

बायर ने शोध में जितना पैसा लगने का दावा किया था, जांच में वह सही नहीं निकला। पता पड़ा है कि यह दवा ‘ऑर्फन ड्रग’ की तरह विकसित की गई थी। आर्फन ड्रग उस दवा को कहते हैं, जिसकी जरूरत कम मरीजों को होती है, इसलिए उनका बाजार इतना आकर्षक नहीं होता कि कंपनियां उनके शोध और विकास पर पैसा लगाएं। अक्सर ऐसी दवाओं पर शोध सरकारी अनुदान से होता है।

एक बड़ी समस्या आधुनिक इलाज के साथ यह है कि विकसित व विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं में बड़ा फर्क है। अमेरिका में एक डॉलर की कोई गोली या कैप्सूल महंगी नहीं मानी जाएगी, लेकिन भारत में 50 रुपये बड़ी रकम हो सकती है। जब तक दवा पर किसी कंपनी का एकाधिकार होता है, तब तक वह उसकी कई गुना कीमत वसूल करती है, और जब पेटेंट खत्म होने को होता है, तो अक्सर किसी बहाने से वह पेटेंट बढ़ाने की भी कोशिश करती है। एक तरीका किसी दवा की रासायनिक संरचना में थोड़ी-बहुत फेर-फार करके उसे नई दवा की तरह पेटेंट करवाने का है। इस तरह के कई मामले तमाम देशों के पेटेंट महानियंत्रक के पास या अदालतों में चल रहे हैं।

भारत इस पूरे परिदृश्य में इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत का दवा उद्योग बहुत बड़ा है और यह अफ्रीका तथा एशिया के कई देशों को अपेक्षाकृत सस्ती दवाएं भी मुहैया कराता है। एक और अच्छी बात यह है कि धीरे-धीरे भारत भी दवाओं के शोध एवं विकास के एक बड़े केंद्र की तरह विकसित हो रहा है, यह प्रक्रिया तेज होनी चाहिए। अगर हम खुद अपनी जरूरतों के मुताबिक दवाएं विकसित करें, तो उससे हमारे समाज का ज्यादा भला होगा।

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