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सहमे हुए अल्पसंख्यक

पाकिस्तानी ह्यूमन राइट कमीशन ने अपनी जांच में सिंध में एक हिंदू लड़की को अपना मजहब बदलने के लिए मजबूर किए जाने के आरोप की तस्दीक की है। इसके साथ ही एक बार फिर अकलीयत हिंदुओं की तकलीफ खुलकर सामने आई है। कई हिंदू परिवारों का कहना है कि हर महीने औसतन 20 हिंदू लड़कियों को जबरिया इस्लाम कुबूल करवाया जा रहा है और इसकी वजह से वे खौफ व असुरक्षा के माहौल में जी रहे हैं। ऐसे हर मामले की शुरुआत पीड़ित परिवार के इस आरोप के साथ होती है कि उनकी बेटी को अगवा किया गया तथा जबरन उसका मजहब बदल दिया गया, जबकि कहानी का अंत अदालती फैसले की शक्ल में आता है कि लड़की के इकरारनामे के मुताबिक उसने अपनी मर्जी से यह कदम उठाया।

इस तरह के मुकदमों की सुनवाइयां बेहद संगीन हालात में होती हैं और आरोप है कि पुलिस व इस्लामी कट्टरपंथी शिकायती परिवार को अंजाम भुगतने की धमकी देते हैं। यही नहीं, वे पीड़ित लड़की को अपने परिजनों से मिलने तक नहीं देते। एक ही तरह की लगातार घटती घटनाओं को देखते हुए पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग ने उचित ही मजहब बदलने की घटनाओं की सच्चाई पर सवाल उठाए हैं। इस मुल्क में इंसानी हक के लिए लड़ने वाले लोग पूछ रहे हैं कि आखिर क्यों सिर्फ शादी लायक हिंदू लड़कियां ही इस्लाम कुबूलती हैं, जबकि इसी उम्र के लड़के ऐसा नहीं कर रहे? खौफ व असुरक्षा के कारण हिंदू परिवारों के पाकिस्तान छोड़कर हिन्दुस्तान व अन्य जगहों की ओर जा बसने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

हालांकि सिंध असेंबली ने इस मसाइल पर हाल ही में बहस की है, लेकिन सूबे की हुकूमत अकलीयतों के साथ हो रहे इस बर्ताव पर अब भी खामोश है। उसकी यह बेरुखी निहायत अफसोसनाक है। हुकूमत को ताजा मामले में तत्काल कदम उठाना चाहिए और पीड़ित लड़की को हिफाजती इदारों को सौंपते हुए अपहरण व जबरिया धर्म परिवर्तन के इस मामले की गहरी तफ्तीश करानी चाहिए। जमहूरी उसूलों और शालीनता का तकाजा यही है कि मजहबी बाड़ेबंदी और इससे जुड़े लोगों की पहचान से परे इंसाफ किया जाए।
डॉन, पाकिस्तान

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