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आम बजट से उम्मीदें

इस बार के आम बजट से समाज के सभी तबकों को काफी उम्मीदें हैं। आखिर हों भी क्यों न, जनता शुरू से ही यह मानती आ रही है कि आर्थिक सुधारों को लागू करने के प्रति संप्रग सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति दूसरों से अधिक है। केंद्र सरकार चाहे, तो आम बजट के जरिये अपनी छवि सुधार सकती है। इसके लिए सबसे पहले केंद्र सरकार जनता को आर्थिक राहत दे। इस राहत के दो रास्ते हैं। पहला, सरकार आयकर की छूट सीमा में बढ़ोतरी करे। इससे मध्यवर्ग को काफी राहत मिलेगी। खास तौर पर सरकारी व निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के कर का बोझ कम होगा। दूसरा, सरकार चाहे, तो सेवा कर में भी कमी कर सकती है। इससे एकाएक बाजार का भाव नीचे आ जाएगा। हालांकि ये दोनों कदम सरकारी खजाने के लिए अच्छे नहीं होंगे, क्योंकि इससे सरकार पर न केवल आर्थिक बोझ बढ़ेगा, बल्कि राजस्व भी घटेगा। परंतु जनता की उम्मीदों का बोझ न उठाने से बेहतर है कि सरकार आर्थिक बोझ वहन करे।
कपिल मित्तल, न्यू राजेंद्र पैलेस, नई दिल्ली

चुनाव दर चुनाव
पांच राज्यों के चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गए और इनके नतीजे भी आ गए हैं। यानी लोकतंत्र के महापर्व को कामयाबी मिली। फिर भी कुछ सवाल छूट गए, जिन पर बहस होनी चाहिए। सबसे पहला यह कि आखिर कब तक हमारे सरकारी मुलाजिम चुनाव डय़ूटी के नाम पर परेशान होते रहेंगे? कब तक अर्ध सैनिक बल चुनाव करवाने के लिए इस से उस राज्य तक आते-जाते रहेंगे? आखिर इन्हें भी थकावट होती होगी। इस दिशा में चुनाव आयोग और सरकार, दोनों को सोचना चाहिए।
सुधाकर शर्मा, विजय नगर कॉलोनी, बदायूं

आरक्षण या शिक्षा
देश के कई राज्यों में पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है, फिर भी कई राज्य इस मामले में पीछे हैं। यदि देश भर की पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण मिल जाता, तो निश्चित रूप से महिलाओं की दशा व दिशा बदल जाती। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। वैसे सवाल यह भी है कि मात्र आरक्षण बढ़ा देने से महिलाओं की स्थिति सुधर जाएगी? हकीकत यह है कि जिन सूबों में महिलाओं को स्थानीय निकायों में 50 फीसदी आरक्षण मिला है, उनमें से कई जगहों पर मुखिया, सरपंच या पार्षद तो औरतें हैं। लेकिन उनके सारे काम उनके पति या पुत्र देखते हैं। देखा जाए, तो कागज पर मुहर या अंगूठा लगाने के अलावा इनके पास कोई और अधिकार नहीं हैं। जाहिर है, मात्र आरक्षण दे देने से तस्वीर नहीं बदलेगी। यदि महिलाओं को वास्तविक तौर पर आगे लाना है, तो इन्हें शिक्षित करना होगा। तभी महिला सशक्तीकरण की सार्थकता सिद्ध हो पाएगी।
ए पी सिंह ‘गुरु’, लखनऊ

अभिनय की विद्या
करीब साल भर पहले तक जिस अभिनेत्री के ड्रेसिंग सेंस और एक्टिंग को लेकर मीडिया सवाल उठा रहा था, वही आज शोहरत की बुलंदी पर है। अब तमाम खबरिया चैनल उसकी तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं। दरअसल, हम बात कर रहे हैं अभिनेत्री विद्या बालन की, जिन्हें फिल्म द डर्टी पिक्चर के लिए इस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। इसे समय का फेर कहें या फिर विद्या के बोल्ड फैसलों का असर कि आज फिल्म जगत से जुड़े आलोचक विद्या की एक्टिंग के मुरीद बन गए हैं। निस्संदेह, उनमें ग्लैमरस छवि नहीं तलाशी जा सकती, हालांकि उन्होंने द डर्टी पिक्चर में ही इसे झुठलाया है, फिर भी उनके सौंदर्य पर उनका अभिनय भारी है। आने वाले दिनों में वह अपने बेहतरीन अभिनय से दर्शकों को अभिभूत करती रहेंगी।
श्वेतांशु, शेख सराय, दिल्ली

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