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गोली चले ही क्यों

बैंड, बाजा, बाराती और कारतूसों की आतिशबाजी। शादी-ब्याह हो या जीत का जश्न। खुशी के मौके पर गोलियां दागने का चलन जानलेवा हो चला है। मुखर्जी नगर में सिपाही ने शादी समारोह में फायर कर मासूम की जान ले ली। पहले भी ऐसे वाकिये हुए हैं जहां बेगुनाहों को जान गई। सजा देने का काम कानून का। फिर हम क्या करें? भावनाओं के इजहार में संयम जरूरी है। बंदूक से एक बार गोली निकल गई तो वापस नहीं आती।

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