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भगवान ऋषभ दिया नया जीवनदर्शन

भगवान ऋषभदेव के समय में सभ्यता, संस्कृति व संस्कारों के नये संदर्भ जुड़े। परम्परा प्रतिष्ठित हुई। रीति-रिवाजों का स्वरूप सामने आया। उन्होंने सबको काम, अर्थ, धर्म, मोक्ष की पुरुषार्थ चतुष्टयी की सार्थकता सिखलाई।

यह भगवान ऋषभ का प्रारंभिक दौर था। यानी उनके जन्म और बचपन का दौर। अभी नाभि का नेतृत्व चल ही रहा था। युगलों को जो कल्पवृक्षों से प्रकृतिसिद्घ भोजन मिलता था, वह अपर्याप्त हो गया। जो युगल शांत व प्रसन्न थे, उनमें क्रोध का उदय होने लगा। वे आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। धिक्कार नीति का उल्लंघन होने लगा। जिन युगलों ने क्रोध, लड़ाई जैसी स्थितियां न कभी देखीं और न कभी सुनीं-वे इन स्थितियों से घबरा गये। वे मिले, ऋषभ कुमार के पास पहुंचे और मर्यादा के उल्लंघन से उत्पन्न स्थिति का निवेदन किया। ऋषभ ने कहा-इस स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए राजा की आवश्यकता है।

राजा कौन होता है?
ऋषभ ने राजा का कार्य समझाया। शक्ति के केन्द्रीकरण की कल्पना उन्हें दी। युगलों ने कहा-हममें आप सर्वाधिक समर्थ हैं। आप ही हमारे राजा बनें।
ऋषभकुमार बोले-आप मेरे पिताजी नाभि के पास जाइए, उनसे राजा की याचना कीजिए। वे आपको राजा देंगे। वे चले, नाभि को सारी स्थिति से परिचित कराया। नाभि ने ऋषभ को उनका राजा घोषित किया। वे प्रसन्न हो लौट गये। ऋषभ का राज्याभिषेक हुआ। उन्होंने राज्य-संचालन के लिए नगर बसाया। वह बहुत विशाल था। उसका नाम रखा विनीता-अयोध्या। ऋषभ प्रथम राजा बने। शेष जनता प्रजा बन गई। वे प्रजा का संतान की भांति पालन करने लगे। गांवों और नगरों का निर्माण हुआ। लोग अरण्य-वास से हट भवनवासी बन गये। ऋषभ की क्रांतिकारी व जन्मजात प्रतिभा से लोग नये युग के निर्माण की ओर चल पड़े। उन्होंने राज्य की समृद्घि के लिए गायों, घोड़ों व हाथियों का संग्रह किया। असाधु लोगों पर शासन व साधु लोगों की सुरक्षा के लिए उन्होंने मंत्रिमंडल बनाया। चोरी, लूट-खसोट न हो, नागरिक जीवन व्यवस्थित रहे-इसके लिए उन्होंने आरक्षक-दल स्थापित किया।  राज्य की शक्ति को कोई चुनौती न दे सके, इसलिए उन्होंने चतुरंग सेना और सेनापतियों की व्यवस्था की।

साम, दाम, भेद और दण्ड-नीति का प्रवर्तन हुआ। ऋषभ की दण्ड-व्यवस्था के चार अंग थे-
1. परिभाषिक- थोड़े समय के लिए नजरबंद करना-क्रोधपूर्ण शब्दों में अपराधी को ‘यहीं बैठ जाओ’ का आदेश देना।
2. मण्डलिबन्ध- नजरबंद करना-नियमित क्षेत्र से बाहर न जाने का आदेश देना।
3. बंध- बंधन का प्रयोग
4. घात- डंडे का प्रयोग।

औषध को व्याधि का प्रतिकार माना जाता है, वैसे ही दण्ड अपराध का प्रतिकार माना जाने लगा। इन नीतियों में राजतंत्र जमने लगा और अधिकारी चार भागों में बंट गये। आरक्षण वर्ग के सदस्य ‘उग्र’, मंत्रिपरिषद के सदस्य ‘भोज’, परामर्शदात्री समिति के सदस्य या प्रांतीय प्रतिनिधि ‘राजन्य’ और शेष कर्मचारी ‘क्षत्रिय’ कहलाए।  ऋषभ ने ज्येष्ठ पुत्र भरत को उत्तराधिकारी चुना। यह क्रम राजतंत्र का अंग बन गया। यह युगों तक विकसित होता रहा।

नाभि अंतिम कुलकर थे। उनकी पत्नी का नाम था ‘मरुदेवा’। उनके पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया ‘उसभ’ या ‘ऋषभ’। इनका शैशव बदलते हुए युग का प्रतीक था। युग के एक साथ जन्म लेने या मरने की सहज-व्यवस्था भी शिथिल हो गई। उन्हीं दिनों एक युगल जन्मा। उसके माता-पिता ने उसे ताड़ के वृक्ष के नीचे सुला दिया। वृक्ष का फल बच्चे के सिर पर गिरा और वह मर गया। उस युग की यह पहली अकाल मृत्यु थी। अब वह बालिका अकेली रह गयी। थोड़े समय बाद उसके माता-पिता मर गये। उस अकेली बालिका को अन्य युगलों ने आश्चर्य की दृष्टि से देखा। वे उसे कुलकर नाभि के पास ले गये। नाभि ने उसे ऋषभ की पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। ऋषभ युवा हो गये। उन्होंने अपनी सहोदरी सुमंगला के साथ सुनंदा को स्वयं ब्याहा। यहीं से विवाह-पद्घति का उदय हुआ। इसके बाद लोग अपनी सहोदरी के अतिरिक्त भी दूसरी कन्याओं से विवाह करने लगे।

कुलकर युग में लोगों की भोजन-सामग्री थी-कंद, मूल, पत्र, पुष्प और फल। बढ़ती जनसंख्या के लिए कंद आदि पर्याप्त नहीं रहे और वनवासी लोग गृहस्वामी होने लगे। इससे पूर्व प्राकृतिक वनस्पति पर्याप्त थी। अब बोये हुए बीज से अनाज होने लगा। वे पकाना नहीं जानते थे। कच्चा अनाज खाते थे। समय बदला। कच्चा अनाज दुष्पाच्य हो गया। लोग ऋषभ के पास पहुंचे। समस्या का समाधान मांगा। ऋषभ ने अनाज को हाथों से घिसकर खाने की सलाह दी। कुछ समय बाद वह विधि भी असफल होने लगी। ऋषभ अग्नि की बात जानते थे, किन्तु वह काल एकांत स्निग्ध थी। वैसे काल में अग्नि उत्पन्न हो नहीं सकती। एकांत स्निग्ध व एकांत रुक्ष-दोनों काल अग्नि की उत्पत्ति के योग्य नहीं होते।

समय के चरण आगे बढ़े। काल स्निग्ध-रुक्ष बना, तब वृक्षों की टक्कर से अग्नि उत्पन्न हुई। वह फैली। वन जलने लगे। लोगों ने उस अग्नि को देखा व उसकी सूचना ऋषभ को दी। उन्होंने अग्नि का उपयोग और पाक-विद्या का प्रशिक्षण दिया। खाद्य-समस्या का समाधान हो गया।

ऋषभ ने ज्येष्ठ पुत्र भरत को 72 कलाएं सिखाई। कनिष्ठ पुत्र बाहुबलि को प्राणी की लक्षण-विद्या का उपदेश दिया। बड़ी पुत्री ब्राह्मी को अठारह लिपियों व सुंदरी को गणित का अध्ययन कराया। धनुर्वेद, अर्थशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, क्रीड़ा-विधि आदि-आदि विद्याओं का प्रवर्तन कर लोगों को सुव्यवस्थित व सुसंस्कृत बना दिया। अग्नि की उत्पत्ति ने विकास का स्रोत खोल दिया। पात्र, औजार, वस्त्र, चित्र आदि शिल्पों का जन्म हुआ। अन्नपाक के लिए पात्र-निर्माण आवश्यक हुआ। कृषि, गृह-निर्माण आदि के लिए औजार आवश्यक थे, इसलिए लौहकार-शिल्प का आरंभ हुआ।

सामाजिक जीवन ने वस्त्र-शिल्प और गृह-शिल्प को जन्म दिया। नख, केश आदि काटने के लिए नापित-शिल्प (क्षौर-कर्म) का प्रवर्तन हुआ। इन पांचों शिल्पों का प्रवर्तन आग की उत्पत्ति के बाद हुआ। पदार्थो के विकास के साथ-साथ उनके विनिमय की आवश्यकता अनुभूत हुई। उस समय ऋषभ ने व्यवसाय का प्रशिक्षण दिया। कृषिकार, व्यापारी और रक्षक-वर्ग भी अग्नि की उत्पत्ति के बाद बने। कहा जा सकता है-अग्नि ने कृषि के उपकरण, आयात-निर्यात के साधन और अस्त्रों-शस्त्रों को जन्म दे मानव के भाग्य को बदल दिया। पदार्थ बढ़े तब परिग्रह में ममता बढ़ी, संग्रह होने लगा। कौटुम्बिक ममत्व भी बढ़ा। लौकेषणा और धनैषणा के भाव जाग उठे।

पहले मृतकों की दाह-क्रिया नहीं की जाती थी, अब लोग मृतकों को जलाने लगे। पहले पारिवारिक ममत्व नहीं था, अब वह विकसित हो गया। इसलिए मृत्यु के बाद रोने लगे। उसकी स्मृति में वेदी व स्तूप बनाने की प्रथा भी चल पड़ी। इस प्रकार समाज में कुछ परम्पराओं ने जन्म ले लिया। कर्तव्य-बुद्घि से लोक-व्यवस्था का प्रवर्तन कर ऋषभ राज्य करने लगे। लम्बे समय तक वे राजा रहे। जीवन के अंतिम भाग में वे राज्य त्यागकर मुनि बने। मोक्ष धर्म का प्रवर्तन हुआ। हजार वर्ष की साधना के बाद भगवान ऋषभ को कैवल्य-लाभ हुआ। साधु-साध्वी, श्रवक-श्रविका इन चार तीर्थों की स्थापना की। मुनि-धर्म के पांच महाव्रत और गृहस्थ-धर्म के बारह व्रतों का उपदेश दिया। साधु-साध्वियों का संघ बना। श्रवक-श्रविकाएं भी बनीं।

भगवान ऋषभ कर्मयुग के पहले राजा थे। अपने सौ पुत्रों को अलग-अलग राज्यों का भार सौंप वे मुनि बन गए। सबसे बड़ा पुत्र भरत था। वह चक्रवर्ती सम्राट बनना चाहता था। उसने 98 भाइयों को अधीन करना चाहा। सबके पास दूत भेजे। 98 भाई मिले। आपस में परामर्श कर भगवान ऋषभ के पास पहुंचे। सारी स्थिति भगवान ऋषभ के सामने रखी। पूछा-‘भगवान! क्या करें? बड़े भाई से लड़ना नहीं चाहते व अपनी स्वतंत्रता को खोना भी नहीं चाहते।’

भगवान ऋषभ ने पुत्रों को शिक्षा देते हुए कहा कि युद्घ बुरा है-विजेता के लिए भी और पराजित के लिए भी। पराजित सत्ता को गंवाकर पछताता है और विजेता कुछ नहीं पाकर पछताता है। प्रतिशोध की चिता जलाने वाला उसमें स्वयं न जले, यह कभी नहीं होता। भगवान की आश्वासन भरी वाणी सुनकर वे खुशी से झूम उठे। इस तरह भगवान ऋषभ ने जहां साम्राज्यवाद की स्थापना की, वहीं संयम और त्याग का मार्ग भी दिखलाया।

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