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परिवार की रोगों से रक्षा करता है शीतलाष्टमी व्रत

शीतलाष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनायी जाती है। इसमें शीतला माता का व्रत और पूजन किया जाता है। शीतला अष्टमी व्रत को करने से व्यक्ति के सारे परिवार में दाह ज्वर, पीत ज्वर, दुर्गन्ध से युक्त फोड़े, आंखों के सारे रोग, माता की फुंसियों के निशान तथा शीतलाजनित सारे दोष ठीक हो जाते हैं।

इस दिन प्रात:काल स्नान आदि करके श्रद्धा-भक्ति और विधि सहित शीतला देवी की पूजा की जाती है। इसके बाद एक दिन पहले तैयार किए बासी खाने का भोग लगाया जाता है। भोग लगाकर आनंद-मंगल की कामना की जाती है। यह दिन महिलाओं के विश्राम का भी दिन कहा जाता है, क्योंकि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। इस व्रत को रखने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं।

शीतला माता की कथा
एक गांव में एक स्त्री रहती थी। वह बसौड़े अर्थात् शीतलाष्टमी की पूजा करती और ठंडा भोजन लेती थी। गांव में यह स्त्री ही केवल व्रत रखती थी। एक समय गांव में आग लग गई, जिसमें उस स्त्री का घर छोड़कर बाकी सबके सब घर जल गए। इससे सबको बहुत आश्चर्य हुआ। गांव के सब लोगों ने उस स्त्री से इस चमत्कार का राज पूछा। उस स्त्री ने गांव के लोगों से कहा कि मैं तो बसौड़ा के दिन ठंडा भोजन लेती हूं और शीतला माता का पूजन करती हूं। आप लोग यह कार्य तो करते नहीं हैं। इससे मेरा घर नहीं जला और आप सबके घर जल गए। तब से बसौड़े के दिन सारे गांव में शीतला माता का पूजन आरंभ हो गया।

शीतला स्तोत्र में शीतला का जो स्वरूप बतलाया है, वह माता के रोगी के लिए बहुत मददगार है। इसमें कहा गया है कि शीतला दिगम्बरा हैं, गर्दभ पर सवार रहती हैं। सूप (छाज) झाड़ (माजर्नी) और नीम के पत्तों से अलंकृत हैं और हाथ में शीतल जलघट उठाए हुए हैं।

आमतौर में शीतला रोग के आक्रमण के समय रोगी दाह से निरंतर पीड़ित रहता है। अत: इसे शीतलता की बहुत आवश्यकता रहती है। गर्दभ पिण्डी (गधे की लीद) की गंध से फोड़ों की पीड़ा कम हो जाती है। साफ-सफाई के काम आने वाली वस्तु जैसे झाड़ लगाने से रोग में वृद्धि होती है। अत: इन कार्यों को बिल्कुल नहीं करना चाहिए। केवल सूप और झाड़ रोगी के पास रख दें। नीम के पत्तों से शीतला के फोड़े सड़ते नहीं हैं और जलघट भी उसके पास रखना आवश्यक है।

इस व्रत में रसोई की दीवार पर हाथ की 5 अंगुली घी से लगाई जाती हैं। इस पर रोली तथा चावल लगाकर देवी माता के गीत गाते हैं। इसके साथ शीतला स्तोत्र तथा कहानी सुनी जाती है। रात में जोत भी जलाई जाती है। एक थाली में बासी भोजन रखकर परिवार के सारे सदस्यों का हाथ लगाकर शीतला माता के मंदिर में चढ़ाते हैं। 

इस दिन चौराहे पर भी जल डालकर पूजा करनी चाहिए। फिर बायना निकालकर इस पर कुछ रुपए रखकर अपनी सासजी को चरण छूकर दें। उपरांत किसी वृद्ध को भी भोजन तथा दक्षिणा दें।
पं. वेणीमाधव गोस्वामी

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