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बुढ़वा मंगल: भारतीय संस्कृति का अनूठा पर्व

भारत में प्रत्येक स्थान पर होली अलग-अलग तरह से मनाई जाती है। वाराणसी में इसे मनाने का अपना एक निराला ही अन्दाज है। यहां यह पर्व होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है, जिसे वहां के लोग बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं।

माघ की पूर्णिमा पर प्राय: ‘होली का डांडा’ रोप दिया जाता है और इसी दिन से लोग इसके समीप लकड़ियां और कण्डे इकट्ठा करने लगते हैं। लकड़ियों को इकट्ठा करने का यह काम फाल्गुन पूर्णिमा तक चलता है। इसके बाद उसमें आग लगाई जाती है। यह भी एक प्रकार का यज्ञ है। इसे ‘नवान्नेष्टि यज्ञ’ कहा जाता है। एक उपाख्यान यह है कि इस दिन खेत से नये अन्न को लेकर इस यज्ञ में आहुति दी जाती है और उसके बाद प्रसाद वितरण किया जाता है। यहां होलिका के पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चरण किया जाता है:

असृक्याभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।।

होलिका के दिन खेत से अन्न लेकर यज्ञ में हवन करने की परंपरा है। इस अन्न को होला कहा जाता है। इसीलिए इस पर्व को भी लोग होलिकोत्सव कहते हैं। बनारस की परंपरा में यह पर्व होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है। इसलिए यह मंगल, बुढ़वा मंगल के नाम से जाना जाता है। इस मंगल को बुढ़वा मंगल इसलिए भी कहते हैं कि यह वर्ष के आखिरी मंगल के पूर्व का मंगल होता है। मंगल का अभिप्राय मंगल कामना से है, इसलिए वाराणसी में इस उत्सव को मंगलवार को पूर्ण माना जाता है। होली को प्राय: उत्सव समाप्त हो जाता है, परंतु वाराणसी में इसके बाद मिलने-जुलने का पर्व प्रारम्भ होता है। लोग घर-घर जाकर अपने से बड़ों के चरणों में श्रद्धा से अबीर और गुलाल लगाते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं तथा छोटों को आशीर्वाद देते हैं।

इस पर्व के बाद वाराणसी में नृत्य, संगीत, कवि सम्मेलन एवं महामूर्ख सम्मेलन चलते रहते हैं। लोग बड़े उत्साह से इन सभी सम्मेलनों में जाते हैं। गंगा में लोग नौका विहार भी करते हैं और साथ ही गंगाजी की पूजा भी करते हैं। इसी उल्लास के साथ आने वाले नूतन वर्ष की मंगल कामना करते हुए वाराणसी में यह पर्व मंगलवार को होली के बाद समाप्त समझा जाता है।

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