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पहली महिला राजमिस्त्री होने का गर्व

पुरुषों के पारंपरिक वर्चस्व वाले राजमिस्त्री के पेशे में करमी देवी अपने जैसी महिलाओं के लिए मिसाल बन गई हैं। करनी पकड़ कर घरों की ईंट जोड़ते, गारे से पलस्तर चढ़ाते और बीम के लिए रिंग लगाने में अपनी कुशलता से वह पुरुषों को भी मात देती नजर आती हैं।

शायद 42 वर्षीया करमी ने अपने काम को पेशा नहीं बल्कि पूजा माना, इसलिए पुरुषों की पैठ वाले इस काम को वह बखूबी अंजाम दे रही हैं। अब वह महिला राजमिस्त्री कही जाती हैं और पुरुष राजमिस्त्री के बराबर ही सम्मान और आमदनी भी मिलती है। पांच सालों से उन्होंने बतौर राजमिस्त्री थड़पखना, वर्दमान कंपाउंड, सामलौंग के कई घरों, चट्टी का सरकारी स्कूल और  खुद का आशियाना भी बनाया है।

करमी ने 25-26 वर्षो तक रेजा का काम किया है। खाली समय में ईंट की जुड़ाई में भी हाथ आजमाया। उन्हें कभी नहीं लगा कि राजमिस्त्री का काम पुरुषों का है, बल्कि वह कहती हैं कि महिलाएं भी यह काम बेहतर कर सकती हैं। चूक होने पर महिला होने के कारण निशाना बनाया जाएगा इसलिए वह काम में शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं छोड़तीं।

करमी बताती हैं, रिश्तेदारों की गलती के कारण पति महावीर महतो के साथ उन्हें एक बार जेल जाना पड़ा। वह तो 18 दिन में बाहर आ गई पर महावीर तीन महीने जेल में रहे। उस कठिन वक्त में बच्चों के खातिर उसने राजमिस्त्री बनने की ठानी। 

करमी देवी फिलहाल डुमरदगा इलाके में कई मकान बना रही हैं।  वह कहती है राजमिस्त्री का काम बड़े ध्यान का है।  इसमें साहुल देखकर तागा लगाना, इंच के हिसाब से रॉड बांधना, पटरा फिट करना, ईंटो की सही जुड़ाई आदि गलती नहीं होनी चाहिए।

उसने बताया ढलाई के लिए छह इंच में रड बांधना, बीम के लिए आठ इंच पर रिंग देना, पांच इंच दीवार में पांच एक,दस इंच में आठ एक और ढलाई के लिए तीन एक का मसाला तैयार करना होता है। पल्सतर के लिए सात एक मसाला बेहतर होता है।

इस काम में वह महिलाओं को जोड़ना चाहती हैं, लेकिन अबतक सिर्फ एक महिला ने जिज्ञासा दिखायी है। उसे उम्मीद है कि समय के साथ राजमिस्त्री महिलाओं की संख्या भी बढ़ेगी।

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  • Web Title:पहली महिला राजमिस्त्री होने का गर्व