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भटक गए विकास के लिए एक उम्मीद

अगले वित्त वर्ष का बजट जिस समय तैयार हो रहा है, विकास के आंकड़े तेजी से लुढ़क रहे हैं, वित्तीय संतुलन गड़बड़ाया हुआ है और तेज महंगाई लगातार बनी हुई है। इसके अलावा चालू वित्त वर्ष के लिए 6.9 फीसदी विकास दर का जो लक्ष्य रखा गया था, उसके काफी नीचे आ जाने की आशंका है, वित्तीय हालात तो काफी खराब हैं ही। पिछले साल जब बजट तैयार हो रहा था, तो हालात इसके विपरीत काफी उम्मीदों से भरे थे। आर्थिक विकास दर काफी ठीक थी और वित्तीय घाटा पांच फीसदी के बजट अनुमान से काफी नीचे था। फिलहाल तो मुद्रास्फीति या महंगाई के मोर्चे पर कुछ राहत है, लेकिन अगर सरकार ने उसे काबू करने के पक्के उपाय नहीं किए, तो यह राहत भी तात्कालिक ही साबित हो सकती है।
विदेश के मोर्चे पर भी माहौल चुनौतियों से भरा है, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विकास की धार कमजोर पड़ चुकी है और यूरोप में तो मंदी ही चल रही है। यानी निर्यात के मोर्चे पर मुश्किलें हैं, खासतौर पर यूरोप को होने वाले कपड़ा निर्यात के मामले में। यहां हमें एक चीज ध्यान में रखनी होगी कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी में गिरावट उससे कहीं ज्यादा है, जितनी कि दुनिया के आर्थिक हालात की वजह से होनी चाहिए थी। इसकी वजहें घरेलू समस्याएं हैं, जो खुद हमने ही खड़ी की हैं। उपभोग बढ़ने से महंगाई बढ़ती रही और इसे काबू में रखने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का जो इलाज किया गया, वह वित्तीय नीतियों के कारण कारगर नहीं हो सका। खनन क्षेत्र की समस्याओं को सुलझाया नहीं गया, जिससे कोयले और खनिज लोहे की कमी हो गई। भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण प्रावधानों के मामले में अनिश्चितता बनी रही, जिससे निवेश में कमी आई। साथ ही सरकार के फैसले लेने की गति धीमी हो जाने के कारण जो निवेश आ रहा था, उसमें भी बाधा पैदा हुई। इन हालात में एक ऐसे बजट की जरूरत है, जो कुछ खास मसलों पर ध्यान दे।

पहला और सबसे प्रमुख मसला है कि बजट में वित्तीय संतुलन को ठीक करने के उपाय होने चाहिए। इसके लिए घाटा कम करने और खर्च की गुणवत्ता बढ़ाने जैसे उपाय करने होंगे। खर्च की गुणवत्ता बढ़ाने का अर्थ है कि उपभोग वाले खर्चो को कम किया जाए और निवेश वाले खर्चों को बढ़ाया जाए। पिछले कुछ साल में सरकार ने निवेश वाले खर्च की कीमत पर उपभोग वाले खर्च को बढ़ाया है। सरकार का उपभोग खर्च 2004-5 से 2011-12 तक 5,300 करोड़ रुपये बढ़ चुका है, जबकि इसी दौरान निवेश खर्च में महज 1,800 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है। उपभोग बढ़ाने की वजह से न सिर्फ महंगाई बढ़ी है, बल्कि कृषि और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में निवेश की सरकार की क्षमता पर भी असर पड़ा है।
वित्तीय घाटा 4.6 फीसदी के बजट लक्ष्य से कम से कम एक फीसदी अधिक रहने की आशंका है, क्योंकि इस दौरान राजस्व की उगाही कम हुई है और सब्सिडी काफी तेजी से बढ़ी हैं। यानी अगले बजट में न सिर्फ वित्तीय घाटा कम करना होगा, बल्कि घाटे को लगातार कम करने का एक रोडमैप भी पेश करना होगा। वित्तीय स्थिति सुधारने की राह में एक तो मंदी बाधा है, दूसरी समस्या है राजस्व में कमी की, क्योंकि राजस्व विकास दर के साथ ही बढ़ता है और उसी के साथ घटता है। अगले साल हम सर्विस टैक्स बढ़ाकर और टैक्स के आधार को विस्तृत करके कुछ हद तक कम हुए राजस्व की भरपाई कर सकते हैं। लेकिन वित्तीय हालात सुधारने की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि सब्सिडी वितरण में सुधार किए जाएं और कृषि कर्जों को माफ करने जैसी चीजों से बचा जाए। आम चुनाव आते-आते इसकी मांग बढ़ने लग जाएगी। यह कड़े फैसले लेने का समय है, अत: डीजल की कीमत को उसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत से जोड़कर शुरुआत की जा सकती है। यही पेट्रोलियम के साथ भी किया जाए, तो इन कीमतों में एकाएक बदलाव से पैदा होने वाले हालात से बचा जा सकता है। इससे न सिर्फ सब्सिडी का भार कम होगा, बल्कि मांग भी तर्कसंगत बनेगी।

जब तक लोगों के लिए रोजगार के पक्के अवसर उपलब्ध नहीं होते, तब तक उन्हें मनरेगा के तहत आर्थिक सुरक्षा देना जरूरी है। वैसे मनरेगा ने ग्रामीण न्यूनतम मजबूरी बढ़ाने का काम भले ही किया हो, लेकिन इसने उत्पादकता बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभाई है। महंगाई का दबाव भी इससे ही पैदा हुआ है। अब इस कार्यक्रम के तहत दिए जाने वाले मेहनताने को मुद्रास्फीति से जोड़ दिया गया है, इसलिए इसका इस्तेमाल कृषि उत्पादकता बढ़ाने व ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में होना चाहिए। यह शुरुआत इस बजट से ही हो जानी चाहिए और इसकी निगरानी का तरीका भी बनना चाहिए।

कृषि क्षेत्र को अभी तक आर्थिक सुधारों से दूर रखा गया है, अब इसकी बहुत सख्त जरूरत है। खाद्य पदार्थो की पिछले कुछ समय में जिस तरह से कीमतें बढ़ी हैं, उससे भी यह बात साफ हुई है, क्योंकि इस दौरान उनकी आपूर्ति नहीं बढ़ी। अब सरकार को सिंचाई और ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर में ठोस निवेश करना होगा, ताकि आपूर्ति को बढ़ाया जा सके और कर्ज पर इस क्षेत्र की निर्भरता को कम किया जा सके। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को किसी भी कीमत पर लोक-लुभावन नीतियों को छोड़ना होगा। चुनाव आते ही इस तरह की नीतियों की मांग हमेशा बढ़ने लग जाती है। 2007 में ऐसे ही हालात में कृषि कर्जों को माफ किया गया था, उसके बाद से इसकी मांग और इसके वायदे लगातार होते रहे हैं।
वैसे तो बजट आर्थिक सुधारों को लागू करने का मंच नहीं है, लेकिन सुधार के क्षेत्र में पिछले कुछ समय से जो सूखा पड़ा हुआ है, उसे देखते हुए इसकी तुरंत जरूरत है, ताकि व्यवसायों में लगे लोगों के हौसले बुलंद किए जा सकें, यानी बजट सुधारों को पटरी पर लाने का एक अवसर तो बन ही सकता है। इसलिए आने वाले बजट से यह उम्मीद तो है ही कि वह डॉयरेक्ट टैक्स कोड के अलाव गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स की शुरुआत करेगा और इससे विदेशी निवेश को भी नई तेजी मिलेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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