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इनके श्रम का इतना अवमूल्यन क्यों

उनके काम को काम मानता ही कौन है? मास्टर कार्ड के वर्ल्ड वाइड इंडेक्स के अनुसार, भारत में सौ पुरुषों के श्रमबल पर सिर्फ 35 महिलाएं हैं, जबकि अन्य बाजारों में यह अनुपात सौ पर सत्तर का है। पर क्या ये आंकड़े जमीनी सच्चाई से परे नहीं हैं? क्योंकि जाति, वर्ग और उम्र की परवाह न करते हुए सभी भारतीय महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे घर के अदृश्य और अवचेतन कार्यों की जिम्मेदारी बखूबी निभाएं। भारतीय महिलाएं जीवन भर काम करती हैं, पर इस सच को स्वीकार नहीं किया जाता।

समस्या आंकड़े जमा करने के तरीके में है, जिसमें उसी को ‘श्रम’ माना जाता है, जिसके बदले में ‘धन’ मिलता हो। इसके अलावा सर्वेक्षण करने वाले लोग अक्सर सिर्फ ‘घर के मुखिया’ से बातचीत करते हैं, जिनसे जब पूछा जाता है कि क्या आपके परिवार की महिलाएं काम करती हैं? तो उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है- ‘वे घरेलू औरतें हैं।’ अर्थव्यवस्था में महिलाओं के योगदान को कम आंके जाने के तथ्य को स्वीकारते हुए 2001 की जनगणना में महिला कामगारों की पहचान करने का कार्य आरंभ किया गया। खेतों में काम करना, वस्तुओं का निर्माण करना आदि को इस श्रेणी में शामिल किया गया। परंतु 2001 की जनगणना के आर्थिक वर्गो की गणना करते हुए घरेलू महिलाओं के श्रम की पूरी तरह से अनदेखी की गई। सरकार के आर्थिक वर्गीकरण में देश की आधी आबादी को इस नजरिये से देखा जाना न केवल श्रम की गरिमा के प्रति घोर संवेदनहीनता है, बल्कि यह लैंगिक पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा भी है। यहां उन्हें ही उत्पादक की श्रेणी में रखा जाता है, जो अपने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर काम करते हैं, जबकि एक स्त्री घर के सभी कार्यो को कुशलता से संपन्न करते हुए अपने परिवार की देखभाल करती है। उसका श्रम अमूल्य है, उसके त्याग, समर्पण और स्नेह को फिलहल छोड़ भी दें, तो भी उस कार्य की कीमत बाजारी गणना के अनुरूप हजारों रुपये में होगी।

एवेजेलिकल सोशल एक्शन फोरम और ग्लोबल एनजीओ हेल्थ ब्रिगेड की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय गृहिणियों के काम की वार्षिक फाइनेंशियल वैल्यू 28,20,000 करोड़ रुपये थी। इन आंकड़ों के हिसाब से एक औसत भारतीय गृहिणी हर साल 78,000 रुपये भारतीय अर्थव्यवस्था में जोड़ती है। देश में आधिकारिक अध्ययनों और सर्वेक्षणों में आज भी घरेलू महिलाओं की गिनती एक गैर-उत्पादक वर्ग में की जाती है। विश्व के अनेक देशों में उत्पादकता के लिहाज से घरेलू स्त्रियों के योगदान को उत्पादक वर्ग में अहम भूमिका निभाने वाला माना जाता है। आर्थिक तौर पर उन्नति के लिए हर मोर्चे पर प्रयत्नशील घरेलू स्त्रियों के कार्य के आर्थिक महत्व को अस्वीकार करने की मानसिकता दरअसल देश को किसी न किसी रूप में पीछे ही ले जा रही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 

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