DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मारें या मार खाएं, खबरों में छाएं

क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। जूता मारना तो प्रतिक्रिया व्यक्त करने की प्राचीनतम विधा है। दुर्भाग्य से इसे सभ्य समाज में उचित स्थान नहीं मिला। प्रतिक्रिया का गुब्बारा जब फूलता है, तो वह कोई भी शक्ल धारण कर सकता है। पिछले दिनों प्रतिक्रिया के गुब्बारे ने ज्यादातर जूते का स्वांग धरा, तो कहीं-कहीं यह स्याही के रूप में देखा गया। बुश, चिदंबरम को जूते, तो योगगुरु को स्याही का सामना करना पड़ा। भद्रजन भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रहे। शाहरुख बनाम शिरीष और सैफ बनाम शर्मा में थप्पड़ और घूंसे का प्रयोग पाया गया। रूटीन खबरों के बीच इन चटपटी-मसालेदार खबरों से टीआरपी की सेहत में पर्याप्त सुधार देखा गया।

जीवन से निराश लोग, जिन्होंने सपना देखा था कि कभी मीडिया की सुर्खियां बनेंगे, ऐसे नेता-अभिनेता, जो लंबे समय से हिट का इंतजार कर रहे थे या ऐसे प्रबुद्ध श्रोता-पाठक, जो शीला की जवानी देख-देखकर बोर हो गए हैं, उनकी निराश जिंदगी में मूसली-पॉवर लेकर आए ये थप्पड़, घूंसे-जूते व कालिख! पहले ब्रेकिंग-न्यूज जलेबीबाई में ही उलझकर रह जाती थी, अब वह मुन्नी की मोहताज नहीं रही।

जूते ने आम आदमी को यह सुअवसर प्रदान किया है कि वह भी बिना पसीना बहाए खबरों में छा सकता है। इस विधा के क्रांतिकारी तरीके से हिट होने के अनेक कारण हैं। एक तो यही कि यह आम आदमी की सूट करता सीधा-सरल-सा तरीका है, जो इस्तेमाल में भी बेहद आसान है। इसमें चूक की संभावना बिल्कुल नहीं है, बल्कि जूते-थप्पड़ों के निशाने पर न लगने के बाद भी लक्ष्य प्राप्ति की पूरी गारंटी है। इस तरीके में एक सिरे पर सेलीब्रेटी है, तो दूसरी तरफ आम आदमी। अत: यह दो मुंह वाले सांप की तरह काम करता है। यह सस्ता-सुलभ भी है। एक अतिरिक्त फीचर यह भी है कि इस प्रक्रिया में माफी मिलने की सुविधा मुफ्त में ही उपलब्ध है, उसका लाभ लेना न चूकें।

इसका सावधानीपूर्वक इस्तेमाल जहां हीरो को जीरो बना सकता है, वहीं यह जीरो को हीरो बनाने में भी सक्षम है। कई बार पिटने वाले के साथ सहानुभूति की लहर चल पड़ती है। पीटने वाला खलनायक बन जाता है। इसलिए सोच-समझकर ही सही ऑप्शन चुनना चाहिए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:मारें या मार खाएं, खबरों में छाएं