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क्रिकेट से याद आया

एक ऐसा शहर, जिसने खुली आंखों को सपने दिए, तो खुले मैदान को जुनून। देश को जीता-जागता भगवान दिया, तो 22 गज की पिच का वरदान। उसी मुंबई से शुरू होती है यह कहानी, जिसका नाम है..‘क्रिकेट से याद आया! सफेद कपड़ों में तब यह खेल सचमुच जेंटलमैन गेम था। अंग्रेज चूंकि हिन्दुस्तान में ही थे, लिहाजा उन्हें बॉल फेंकते-फेंकते हमने भी जल्द ही इस खेल के गुर सीख लिए। सन 47 में अंग्रेज तो चले गए, पर हम उनका खेल सीख चुके थे। 80 के दशक में क्रिकेट मैदान से उठकर टीवी पर आ गया। घर-घर में घुस रहे टीवी ने उसे सिर-माथे पर बिठा दिया। वनडे के पैदा होने से पहले तक मुंबई का बीसीसीआई परिवार गरीब जरूर था, पर तब भी उसमें खुशहाली थी। लेकिन वनडे के आते ही उसकी तकदीर ऐसी पलटी कि वह दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड बन गया। ट्वंटी-20 के पैदा होने के बाद अचानक कहानी करवट लेती है। खिलाड़ी हथौड़े के नीचे आ गए। उनकी बोली लगने लगी। क्रिकेटर की अहमियत अब खेल से नहीं, बल्कि उसे खरीदे जाने और बिकने की कीमत से तय होने लगी। नीलामी के इस तमाशे में हथौड़े के नीचे कुछ खिलाड़ी तो ऐसे भी आ गए, जो अनमोल थे। और इसी खरीद-फरोख्त ने टीम इंडिया की एकता में पहली बार दरार डाली, भला मेरी कीमत तेरी कीमत से कम कैसे?..टीम पिटती रही और मुखिया अपनी टकसाल में बेफिक्र सोता रहा। वक्त आ चुका है जागने का। वरना कहीं इतनी देर न हो जाए कि सचमुच लोग कहने लगें कि एक थी टीम इंडिया।
आजतक वेब पोर्टल में शम्स ताहिर खान

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