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इरादे और उम्मीदें

राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने बजट सत्र की शुरुआत पर अपना अभिभाषण पढ़ा। यह उनका अपने इस कार्यकाल का अंतिम अभिभाषण है, क्योंकि जुलाई में नए राष्ट्रपति का चुनाव होगा। परंपरा के मुताबिक, राष्ट्रपति ने अभिभाषण में सरकार के इरादे और उम्मीदें जाहिर कीं। सरकार जानती है कि इन उम्मीदों के पूरे होने में बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। संप्रग का दूसरा कार्यकाल संसद में गतिरोध और टकराव के लिए जाना जाएगा, जिसकी वजह से सरकार के कई विधेयक और फैसले अधर में लटक गए। गतिरोध के लिए जिम्मेदार सरकार और विपक्ष दोनों हैं, जिन्होंने तालमेल व आपसी समझदारी दिखाने की जरा भी कोशिश नहीं की। यह स्थिति भविष्य में शायद ही बदले। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद विरोधी दल सरकार को कमजोर मानकर ज्यादा आक्रामक होंगे, तो उनके साथ कुछ सहयोगी भी विद्रोही मुद्रा अपना सकते हैं। गनीमत यह है कि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा का प्रदर्शन भी उतना ही या उससे भी बुरा रहा है और वह विपक्षी आक्रमण का नेतृत्व नहीं कर पाएगी। बाकी क्षेत्रीय दलों में तालमेल ऐसा नहीं है कि वे संगठित होकर सरकार को घेरें। लेकिन सरकार के लिए मुश्किलें ज्यादा तो हैं ही। ऐसे में, जो इरादे सरकार ने व्यक्त किए हैं, उन्हें पूरा करना मुश्किल है। यह उम्मीद अभिभाषण में की गई है कि सरकार जल्दी ही विकास दर को 8-9 प्रतिशत तक ले आएगी। अर्थव्यवस्था की स्थिति को देखते हुए यह होना मुश्किल लगता है। अगर विकास दर को तेजी से बढ़ाना है, तो कई बड़े सुधार करने होंगे। वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) एक बड़ा कदम हो सकता है, जिसका जिक्र राष्ट्रपति ने किया, लेकिन यह मामला जितने दिनों से लटका है, उसी से पता चलता है कि उस पर राजनीतिक आम सहमति बनाना कितना मुश्किल हो रहा है। अगर अब भी सरकार और विपक्ष तालमेल नहीं बनाते, तो फिर हर मुद्दे पर गतिरोध की स्थिति आ जाएगी। सरकार को यह समझना होगा कि संवाद और तालमेल की कमी से उसके कितने फैसले रुके हुए हैं, जिनका जिक्र राष्ट्रपति के अभिभाषण में है। इससे यह छवि बनी है कि सरकार कोई फैसला नहीं कर पा रही है या फैसले की घोषणा करके फिर पलट जाती है। विकास और निवेश का माहौल इसी वजह से ठिठका हुआ है। विपक्ष को भी समझना होगा कि उसे अतिरिक्त आक्रामक रवैये और अड़ंगेबाजी का कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला।

राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए उठाए गए कदमों का प्रमुखता से जिक्र किया है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जो पिछले कुछ वर्षों से सार्वजनिक जीवन पर छाया रहा है। जनता भ्रष्टाचार से कितनी आजिज आ चुकी है, यह चुनाव परिणामों से जाहिर है और पिछले दिनों हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से भी यही संकेत मिलते हैं। समस्या यह है कि इस भ्रष्टाचार विरोधी माहौल में सरकार, विपक्ष और आंदोलन के नेताओं ने लोकपाल पर बाल की खाल निकालने में ही सारी ऊर्जा खर्च की और ठोस फैसले और कदम उठाना मुल्तवी कर दिया गया। सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए व्यापक प्रशासनिक एवं न्यायिक सुधार करने होंगे और यह तभी हो सकता है, जब सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाने की बजाय मिल-बैठकर ठोस कदम उठाने का फैसला करें। राष्ट्रपति के अभिभाषण के बीच जिस तरह से व्यवधान हुए, उससे तो लक्षण यही दिखते हैं कि यह सत्र भी हंगामेदार होगा। राष्ट्रपति के भाषण में इरादे तो शानदार जाहिर किए गए हैं और उनमें असहमति की कोई जगह नहीं है, लेकिन उन्हें कार्यान्वित करने के लिए सबसे पहले सरकार तथा विपक्ष को आपस में संवाद व सहयोग की पहल करनी होगी।

 

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