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त्रासदी का एक साल

एक साल पहले, 11 मार्च 2011 को प्रशांत महासागर के तटीय इलाकों में जबर्दस्त भूकंप व सुनामी का कहर टूटा था। उस त्रासदी में जो जिंदा बच गए, वे आज भी विनाशकारी प्रभावों को झेल रहे हैं। फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में हुए विस्फोट के बाद प्राकृतिक आपदा की विनाश लीला और बढ़ गई। रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचने के लिए करीब एक लाख 13 हजार फुकुशिमा निवासियों को अपने घर-बार वे इलाके छोड़ने पड़े। इनमें से कई तो आज भी अपने घर नहीं लौट सकते। बल्कि दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी लोग रेडियोधर्मी विकिरण के खतरों से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकार को राहत व पुनर्निर्माण कार्यों में सावधानी बरतने के साथ-साथ और तेजी लानी चाहिए, ताकि ‘जापान के पुनर्जन्म का अहसास हो।’ निस्संदेह, जिन लोगों पर 3/11 का सीधा प्रभाव नहीं पड़ा, वे भी उस तबाही को नहीं भूल पाएंगे। अलबत्ता, आपदा पीड़ितों की मदद के लिए ऐसे लोगों से जो भी बन सका, उन्होंने किया है। नेशनल पुलिस एजेंसी रिकॉर्डस के मुताबिक, इस त्रासदी ने 15,854 लोगों की जिंदगी लील ली। 3,167 लोग तो अब भी लापता हैं। तबाही के बाद फैली बीमारियों व दूसरी वजहों से मरने वालों की तादाद 23,000 के आंकड़े को पार कर गई है। जो बच गए, उन्होंने अपनों को खोया। इसलिए निर्माण कार्य से जुड़े सरकारी व निजी क्षेत्रों की यह जिम्मेदारी है कि वे लोगों को एक-दूसरे के करीब लाएं। ऐसे भवन बनाए जाएं कि स्थानीय लोगों में निकटता का अहसास हो। इस त्रासदी ने करीब तीन लाख सत्तर हजार इमारतों को जमींदोज कर दिया था। करीब चार हजार सड़कें टूट गई थीं। इससे अंदाजन 16.9 ट्रिलियन येन की आर्थिक क्षति पहुंची। इसकी भरपाई के लिए 10 फरवरी को रीकंस्ट्रक्शन एजेंसी का गठन किया गया। अब इसकी जिम्मेदारी है कि हमारे जख्मों को कम करे। अगर पुनर्निर्माण के कामों में आर्थिक दिक्कतें आती हैं, तो सरकार को पर्याप्त धन मुहैया कराना ही होगा। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन को वक्त-बेवक्त निर्देश देने की जरूरत भी पड़ेगी। यह भी ध्यान रखना होगा कि अगर राहत व पुनर्निर्माणों कामों में देरी होती है, तो नागरिकों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। 
        द जापान टाइम्स, जापान

 

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