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यात्रियों पर रहम कीजिए

पिछले दिनों रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने सांसदों के एक समूह से बातचीत करते हुए यह संकेत दिया था कि रेलवे की माली हालत ठीक नहीं है। इसे सुधारने के लिए यात्री भाड़े में बढ़ोतरी संभव है। दूसरी तरफ, काकोदकर पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रेलवे के सामने पैसे की नहीं, प्रबंधन की समस्या है। ऐसे में अगर सरकार इस बार यात्री भाड़े में बढ़ोतरी करती है, तो इससे यात्रियों पर बेवजह आर्थिक बोझ बढ़ेगा तथा महंगाई की एक और मार जनता को झेलनी पड़ेगी। ठीक है कि पिछले आठ साल से यात्री भाड़ा नहीं बढ़ाया गया है, लेकिन जनहित को देखते हुए भलाई इसी में है कि सरकार इस बार भी रेल भाड़े को जस का तस रहने दे और आमदनी के दूसरे रास्तों को तलाशे। माल ढुलाई से ज्यादा कमाई मुमकिन है। इसके अलावा बेहतर प्रबंधन के जरिये रेलवे फिजूलखर्ची को कम कर सकती है। इसलिए रेलवे अपने प्रबंधन पर ध्यान दे।
एम. हैरीस

जीत का दूसरा पहलू
लोकतंत्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार की लोकप्रियता पर संदेह करना उचित नहीं है। फिर भी उत्तर प्रदेश में जिस तरह के वोट समीकरणों के आधार पर नई सरकार बनने जा रही है, वह इस प्रदेश व देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। समाजवादी पार्टी ने लोक लुभावने वायदों के सहारे बहुमत हासिल किया है। लेकिन अब ये वायदे पूरे कैसे होंगे? अगर सपा किसी कीमत पर इन्हें पूरा करेगी, तो प्रदेश की आर्थिक नैया डूब जाएगी। एक बात और। सपा ने अपने वोट बैंक का खास खयाल रखा, तो इससे जाति आधारित राजनीति को ही बढ़ावा मिलेगा। वैसे भी एक बार फिर काफी संख्या में दागी, अशिक्षित व अयोग्य उम्मीदवार जीतकर विधानसभा में पहुंच गए हैं। यह सुदृढ़ लोकतंत्र के ठीक विपरीत है।
मनोज भारतीय, मेरठ   

हाशिये पर मजदूर
पीतल की नगरी के नाम से दुनिया भर में विख्यात मुरादाबाद एक ऐसी औद्योगिक नगरी है, जिसने न जाने कितने लोगों को रोजगार प्रदान किया है। परंतु विडंबना यह है कि यहां मजदूरों को सही मेहनताना नहीं मिलता। फैक्टरियों में काम करने वाले मजदूर मालिकों व मैनेजरों के बीच पिस रहे हैं। जब भी वे काम मांगने जाते हैं, तो उन्हें मजदूरी कुछ और बताई जाती है, लेकिन दी कुछ और जाती है। साफ तौर पर यह मालिक व मैनेजर की कथनी एवं करनी के फर्क को दर्शाता है। हालांकि इस पीतल नगरी में बने उत्पादों की मांग विदेशों में भी है, परंतु इन्हें बनाने वाले मजदूरों के घर में दो वक्त का खाना नहीं बन पाता। अगर मैनेजरों से बात करें, तो वे कहते हैं कि मजदूरों के कल्याण और स्वास्थ्य पर काफी धन खर्च किया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि सुविधाएं इन्हें नाममात्र ही मिलती हैं। अगर मजदूर बुखार के चलते एक दिन काम पर न जाए, तो उस दिन की मजदूरी काट ली जाती है। यह श्रमिक का खून चूसना नहीं, तो और क्या है? हालांकि यह सिर्फ मुरादाबाद की सच्चाई नहीं है। चाहे जयपुर हो या जमशेदपुर, हर जगह श्रमिकों के खून से कारोबारी अपने सपने पूरे करते हैं। सरकार को चाहिए कि वह असंगठित मजदूरों की दयनीय स्थिति को समझे और इन्हें उचित न्याय और उनका अधिकार दिलवाए।
जितेंद्र कुमार

चलो देखें हवाओं को
चलो देखें हवाओं को, कहां तक दिल लगाएंगी/इशारों ही इशारों में, कहां तक गुनगुनाएंगी/अभी तो दर्द उभरा है, जरा खुद को संभालें हम/ निगाहें जो बरसती हैं, जरा-सी सूख जाएंगी।
‘तुषार’ देवेंद्र चौधरी, वैशाली, गाजियाबाद

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