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सपा शासन में राज्य विभाजन की कोशिश ठंडे बस्ते में

विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद उत्तर प्रदेश के चार हिस्सों में विभाजन की कोशिश अब ठंडे बस्ते में चली गई है।

उत्तर प्रदेश की कार्यवाहक मुख्यमंत्री मायावती ने अपने शासनकाल में राज्य को बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश में विभाजित करने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराने के बाद केन्द्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा था।

बसपा सरकार ने गत 21 नवम्बर को विधानसभा में राज्य को चार हिस्सों में बांटने का एक लाईन का प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव पर न तो बहस हुई थी और न रायशुमारी ही।

सपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसनें राज्य विभाजन का खुला विरोध किया था। पार्टी का साफ कहना था कि छोटे राज्यों का विकास जल्द होता है इस बात में दम नहीं रह गया है। उत्तराखंड और झारखंड इसके उदाहरण हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार से अलग होने के बाद भी जस के तस हैं।

सपा शुरू से ही राज्य विभाजन की विरोधी रही है। उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड को अलग करने का भी सपा ने विरोध किया था। हालत यह हो गई थी कि सपा के उत्तराखंड से आने वाले विधायक और मैदानी इलाके के विधायक दो खेमें में बंट गए थे।

सपा ने उधमसिंहनगर के उत्तराखंड में भी जाने का विरोध किया था क्योंकि वह पूरी तरह से मैदानी इलाका है और वहां सिख आबादी काफी ज्यादा है। सपा का कहना है कि उत्तर प्रदेश में तराई का यह इलाका किसी भी हालत में उत्तराखंड में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। उधमसिंहनगर के लोग भी उत्तराखंड में जाना नहीं चाहते थे।

सपा के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा कि उत्तर प्रदेश का विभाजन कभी मुद्दा नहीं रहा। सही मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए राज्य विभाजन का शिगूफा छोडा़ गया था। उत्तर प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में बडे घोटाले हुए। बसपा सरकार इन घोटालों से जनता का ध्यान हटाना चाहती थी इसलिए राज्य के विभाजन का मुद्दा उठा दिया गया।

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