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कैलेंडर का मजेदार सफर

संसार भर में कई किस्म के कैलेंडर प्रचलित हैं, जिनमें रोमन, भारतीय, इस्लामी, चीनी और यहूदी प्रमुख हैं।
दुनिया में रोमन कैलेंडर का सर्वाधिक महत्व है। इसे अन्तर्राष्ट्रीय दर्जा भी मिला हुआ है। यही ऐसा कैलेंडर है, जिसमें एक वर्ष में 365 दिन माने गये हैं। विश्व के अन्य कैलेंडरों में एक वर्ष में 14 महीनों तक का वर्णन मिलता है। इसके विकास की कहानी बड़ी पुरानी है। तकरीबन दो हजार वर्ष पहले यूरोप के रोम देश में इस कैलेंडर का अविष्कार हुआ था। पुराने रोमन कैलेंडर के मुताबिक वर्ष में केवल 304 दिन होते थे और एक वर्ष दस महीनों में विभाजित था।

किसी-किसी महीने में बहुत अधिक दिन होते थे और किसी-किसी महीने में बहुत कम। रोम के पोप रोगरी ने जब सत्ता संभाली तो उन्होंने इसमें काट-छांट की। पोप रोगरी ने फिर इस कैलेंडर को अपने हिसाब से एक जनवरी सन् एक से आरम्भ किया, क्योंकि इसी दिन ईसाई धर्म के जन्मदाता ‘ईसा मसीह’ का जन्म हुआ था। पोप ने कैलेंडर के साधारण वर्ष में 365 दिन और ‘लीप’ वर्ष में 366 दिन रखकर यह घोषणा की कि जो पार की संख्या में विभाजित हो जाये, उसी साल को ‘लीप’ वर्ष समझा जाए। उन्होंने यह भी निश्चित किया कि किस महीने में कितने दिन रहेंगे। बस, तब से ही यह कैलेंडर संसार भर में लोकप्रिय हो गया। ब्रिटिश साम्राज्य में इसका उपयोग 6 जुलाई, 1784 में शुरू हुआ था।
 
हमारे देश में बौद्ध, बंगाली, शक एवं विक्रम सम्वत कैलेंडर भी प्रचलित हैं। इनमें से विक्रम और शक सम्वत विशेष हैं। विक्रम सम्वत ईसा से 57 वर्ष पूर्व 13 जनवरी से उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के राज्यकाल में आरम्भ हुआ था। उस समय इस कैलेंडर को देखने के लिये स्नान कर नए वस्त्र पहनकर मंदिरों में जाना होता था, जहां पंडित को दक्षिणा में मात्र एक तुलसी का पत्ता देकर इसे देखा जा सकता था।

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