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थोड़ा और बदलो

बदलो, तो पूरा बदलो। आधा-अधूरा बदलाव खतरनाक होता है। यह बात दिल्ली ट्रैफिक पुलिस को भी समझनी चाहिए। इसकी इस बात के लिए तो प्रशंसा करनी चाहिए कि इसने बदलाव की कोशिश की है। फेसबुक के जरिये सूचना जुटाने और बांटने का उसका प्रयास इसका ही अंग है। पर अभी कई और बदलाव जरूरी हैं।

दिल्ली-एनसीआर में करीब दस साल पहले दोपहर में जितनी गाड़ियां सड़कों पर होती थीं, अब लगभग उतनी आधी रात के वक्त नजर आती हैं। फिर भी व्यस्त चौराहों पर रेड लाइट ब्लिंक करने लगती हैं। नतीजा, दुर्घटनाएं। ठीक है कि लोगों में सिविक सेंस होना चाहिए। लेकिन सावधानी बरतने से पुलिस को किसने रोका है?

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