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बजट सत्र में तोड़ें पुरानी परंपराएं

आज संसद के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति का अभिभाषण होगा। इसके साथ ही बजट सत्र की शुरुआत हो जाएगी। राष्ट्रपति का अभिभाषण मूलत: सरकार की नीतियों की रूपरेखा ही होता है। पिछले कई वर्षों से इसमें दोहराव-सा दिखाई दे रहा है। मुङो बताया गया है कि ब्रिटेन में जब महारानी संयुक्त सत्र को संबोधित करने आती थीं, तो उनका अभिभाषण उच्च सदन यानी हाउस ऑफ लॉर्डस में होता था। वहां जगह कम होने की वजह से निचले सदन यानी हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्यों को अभिभाषण खड़े होकर सुनना पड़ता था। यहां तक कि प्रधानमंत्री भी खड़े रहकर ही अभिभाषण सुनते थे। यह अभिभाषण पारंपरिक, छोटा और मुख्य मुद्दों तक सीमित होता था।

इसके ठीक विपरीत भारतीय संसद के सेंट्रल हॉल में दोनों सदनों के सदस्य आराम से बैठकर राष्ट्रपति के उस लंबे अभिभाषण को सुनते हैं,  जिसमें कई चीजें बार-बार दोहराई जाती हैं। इसके कुछ दिनों बाद ही बजट भाषण होता है, जो अर्थव्यवस्था, आमदनी और खर्च के हिसाब-किताब के बयान से कहीं आगे जाता है। इसमें सरकार की आर्थिक और समाजिक नीतियों व कदमों की झलक दिखती है। राष्ट्रपति के अभिभाषण से सुरक्षा, विदेश नीति व केंद्र-राज्य संबंधों जैसे वृहद मुद्दों पर प्रकाश पड़ता है। यह उम्मीद की जाती है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में जिन मुद्दों का जिक्र होगा, सरकार उन पर तुरंत कदम भी आगे बढ़ाएगी।

यहां हम जिक्र कर रहे हैं पिछले अभिभाषण की कुछ उन घोषणाओं का, जिन पर अभी तक कुछ भी नहीं किया गया। पिछले अभिभाषण में कहा गया था कि आर्थिक और सामाजिक गैर बराबरी को कम करने के लिए एक भरोसेमंद रोडमैप बनाया जाएगा। लेकिन ऐसा कोई रोडमैप सामने नहीं आया।

राष्ट्रपति के पिछले अभिभाषण में यह भी कहा गया था कि पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। इसके साथ ही औरतों को अधिक रोजगार देने की बात कही गई थी। इसके अलावा महिला सशक्तीकरण पर एक राष्ट्रीय मिशन बनाने का भी वायदा था, लेकिन यह नहीं हुआ। मानव संसाधन और स्वास्थ्य पर एक नई परिषद बनाने की बात की गई थी, न्यायिक सुधार के लिए छह महीने के अंदर एक रोडमैप बनना था। स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों के लिए मॉडल सार्वजनिक सेवा अधिनियम बनाने का भी वायदा किया गया था, लेकिन ऐसा कोई वायदा पूरा नहीं हुआ। माध्यमिक शिक्षा सबको उपलब्ध कराने की बात भी की गई थी, खान व खनिज नियमन अधिनियम बनना था, रेलवे के लिए रोडमैप तैयार होना था, पर कुछ हुआ नहीं।

इतने सारे वायदे कर देने की बजाय क्या यह बेहतर नहीं होता कि राष्ट्रपति का अभिभाषण संक्षिप्त रहता और सरकार ज्यादा काम करती? जाहिर है, चुनींदा घोषणाएं होंगी, तो जनता का ध्यान भी इनकी ओर जाएगा और सरकार पर इन्हें पूरा करने का दबाव बनेगा।

इस बजट सत्र में सरकार को विश्वसनीयता के संकट से भी जूझना होगा। इसलिए नहीं कि उसका बहुमत कम हो रहा है, बल्कि इसलिए कि उसे ऐसे तरीके अपनाने होंगे, जिससे निवेशकों का विश्वास बहाल हो सके। आर्थिक हालात पहले से ही नाजुक हैं और निवेशक भविष्य के अंदेशे को लेकर चिंता में हैं। पिछले कई साल से संसद के काम में बार-बार बाधाएं पड़ने और जरूरी कामकाज न निपट पाने को लेकर जनता में एक तरह का गुस्सा भी है। इससे राजनीतिक ढांचे की भी साख कम हुई है।

इसलिए पहली जरूरत तो यही है कि काम को बिना स्थगन, बिना बाधा के निपटाया जाए, जिससे लोगों का विश्वास बहाल हो सके। मतभेदों पर चर्चा और बहस होनी चाहिए और बाद में जरूरी हो, तो वोटिंग से निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। संसदीय प्रक्रिया में बाधा का फायदा कार्यपालिका को मिलता है, क्योंकि उसे संसद के प्रति जवाबदेह नहीं होना पड़ता। इसलिए इस बार के बजट सत्र में पूरा ध्यान छह मसलों पर दिया जाना चाहिए:

पहला, राष्ट्रपति ने अपने पिछले भाषण में पिछड़ा क्षेत्र अनुदान की पुनर्रचना का वायदा किया था, ताकि सामाजिक और क्षेत्रीय गैर बराबरी को दूर किया जा सके। अब सरकार को इसका रोडमैप पेश करना ही चाहिए कि वह इस गैर बराबरी को दूर करने के लिए आखिर क्या करने जा रही है।

दूसरा, केंद्र-राज्य संबंधों के लिए अब एक नए नजरिये की जरूरत है। राज्यों के पास संसाधन बहुत कम हैं और इन्हें नीतियां लागू करने में काफी दिक्कतें आती हैं, इससे परस्पर विश्वास भी घटता है। इसके अलावा राज्यों को ऐसी योजनाओं पर खर्च के लिए कहा जाता है, जिनके निर्माण में इनकी कोई भूमिका नहीं होती। यह सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ है।

तीसरा, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की कुशलता बढ़ाने के लिए बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है। गरीबी हटाओ योजनाओं का ढांचा फिर से तैयार किया जाना चाहिए, और जिन्हें फायदा पहुंचाना है, उन तक सीधे नकदी पहुंचाने की व्यवस्था बनानी चाहिए।

चौथा, वास्तविक अर्थव्यवस्था के मसलों से हम बच नहीं सकते। ऊर्जा, संचार और नागरिक उड्डयन जैसे क्षेत्र इस समय गहरे संकट में हैं। इन्हें काफी समय तक नजरंदाज किया गया है, इनके लिए कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। इन क्षेत्रों में तत्काल सुधार किए जाने की जरूरत है। इन क्षेत्रों में बाहरी पूंजी लाने की छूट दी जानी चाहिए, ताकि इनकी वित्तीय दिक्कतें कम हो सकें।

पांचवां, राष्ट्रपति के पिछले अभिभाषण में चकित करने वाले रूप से कृषि का जिक्र नदारद था। हमें इस क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ानी ही होगी। इस क्षेत्र के लिए विशेष तौर पर प्राथमिकता के आधार पर एक्शन प्लान बनाने और उसे लागू करने की जरूरत है।

छठा, 2009-10 के अभिभाषण में राष्ट्रपति ने भारत के लिए इनोवेशन दशक की बात की थी। सरकार को रोडमैप बनाकर बताना चाहिए कि वह किस तरह से इनोवेशन दशक की शुरुआत करेगी।

कई साल से नई नीतियां बनाने का काम नहीं हो रहा, अब सुधारों को आगे न बढ़ाना गैर-जिम्मेदारी पूर्ण होगा। उम्मीद है कि इनमें से कुछ मसले वित्त मंत्री के बजट भाषण में जगह बना ही लेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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