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मीडिया की स्वतंत्रता से बढ़ी म्यांमार की साख

जब से म्यांमार की लोकप्रिय नेता आंग सान सू की को नजरबंदी से रिहा किया गया है, वहां लोकतंत्र की नई बयार बहने लगी है। सबसे बड़ी बात यह है कि वहां मीडिया को पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्रता मिल रही है। म्यांमार में दैनिक समाचारपत्र केवल सरकार ही प्रकाशित कर सकती है। परंतु अनेक साप्ताहिक अखबार, जिनमें म्यांमार टाइम्स  प्रमुख है, निजी उद्योगपतियों द्वारा प्रकाशित हो रहे हैं। उन्हें हाल तक यह हिम्मत नहीं होती थी कि वे सू की के पक्ष में या उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेट्स (एनएलडी) के पक्ष में कोई समाचार प्रकाशित करते।

सू की के चित्र को प्रकाशित करने का तो सवाल ही नहीं उठता था। पर अब प्राय: सभी साप्ताहिक पत्र हर सप्ताह अपने मुख्य पृष्ठ पर सू की की तस्वीर छापते हैं और अंदर के पन्नों में उनके भाषण को विस्तार से प्रकाशित करते हैं। ऐसी संभावना है कि सू की शीघ्र ही एक उपचुनाव में ‘का मू’ पार्लियामेंटरी क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगी। इस सिलसिले में उन्होंने अभी से अपना प्रचार शुरू कर दिया है।

अभी हाल तक म्यांमार के अखबारों पर कठोर सेंसरशिप लागू थी। किसी भी साप्ताहिक को अपने प्रकाशन से दो दिन पूर्व पूरे समाचारपत्र का प्रूफ सरकारी सेंसर बोर्ड को भेजना होता था, जहां दजर्नों सरकारी अधिकारी एक-एक शब्द को पूरी सावधानी से पढ़ते थे और सरकार के खिलाफ लगने वाली किसी भी सामग्री पर कैंची चल जाती थी। लेकिन अब हालत यह है कि कुछ साप्ताहिकों ने पूर्व में हुई सैनिक बर्बरता की कहानियों को प्रकाशित करना शुरू कर दिया है। सरकार में कुछ सैनिक अफसर भी शीर्ष पदों पर हैं। परंतु उन्होंने इसकी अनदेखी कर दी है। पत्रकारों को इंटरनेट, कंप्यूटर और फैक्स मशीन रखने की इजाजत भी मिल गई है।

पहले सू की की प्रसिद्ध पुस्तक फ्रीडम फ्रॉम फीयर  पढ़ना अपराध था। अब यह किताब खुलेआम बाजार में बिक रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार पार्लियामेंट में सेंसर बोर्ड को समाप्त करने का बिल ला रही है। सरकार ने यह घोषणा की है कि देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए वह प्राइवेट कंपनियों को भी दैनिक समाचारपत्र प्रकाशित करने की इजाजत दे देगी। इन बदलावों का निश्चित तौर पर उसे फायदा भी मिला है।

म्यांमार में राजनीतिक सुधारों को देखते हुए हाल में आसियान देशों ने एक स्वर से कहा कि म्यांमार को सन 2014 में आसियान का अध्यक्ष नियुक्त किया जाए। इसके पहले जब सन 2006 में म्यांमार के आसियान के अध्यक्ष बनने की बारी आई थी, तब इस संगठन के अधिकतर देशों ने उसका यह कहकर विरोध किया था कि वहां लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया है और वहां एक तरह से सैनिक तानाशाही है। म्यांमार के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि उस पर लगी पाबंदियां हट गई हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी साख बढ़ने लगी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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