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गिन-गिन वक्त गुजारिए बिन गिनती सब सून

अपन गणित में शुरू से कमजोर हैं। हाईस्कूल तक यह अनिवार्य विषय था। हम ही जानते हैं कि इसने हमें कैसे नाकों चने चबवाए हैं। पहाड़े रटने की वर्जिश याद करके आज भी पसीना छूटता है। हमें तो शक होता है कि गणितज्ञ गिनती गिनते हुए पैदा होते होंगे। इस प्रक्रिया में अपनी क्या-क्या दुर्दशा नहीं होती थी। कंधे झुकते थे। पसीना छूटता था। गणित के सवाल लगाते, तो माताजी हमारी तनाव भरी मुद्रा देखकर चिंता करतीं कि सब सही-सलामत तो है। गनीमत है कि पुत्र-मोह में घबराकर उन्होंने कभी डॉक्टर नहीं बुलाया, वरना और भद पिटती।

आज की पीढ़ी भाग्यशाली है। कैल्कुलेटर-कंप्यूटर क्या-क्या उपलब्ध नहीं है उसके पास। रोटी-रोजी के दायरे में हम भले पिछड़े मुल्कों की कतार में हों, लेकिन उपभोक्ता-सामग्री के मामले में हम दुनिया के बड़े बाजार हैं।

गिनती में महारत के बगैर आमदनी-खर्चे का हिसाब गड़बड़ाता ही है। बाजार के दुकानदार किसी को नहीं बख्शते। भारत के संत कवि भी बाजारी गणित में कच्चे रहे होंगे। बाजार हमारी तरह उन्हें भी उल्लू बनाता होगा। अपने जैसे भुक्तभोगी उनके इस दुनियावी दर्द को आसानी से समझ सकते हैं। कुछ कहते हैं कि यह आध्यात्मिक व्यथा है। होगी। अपना ज्ञान तो स्थानीय मंडी के दुकानदार तक सीमित है।

हमें ताज्जुब है। 21वीं सदी में बस औपचारिक मंदिर की कसर है, वरना गिनती की पूजा-आराधना आज सवरेपरि है। अनौपचारिक रूप से जीवन-मूल्यों से लेकर जनतंत्र तक सब गिनती पर निर्भर है। जिसके जितने घर हैं, कारें हैं, जहाज हैं, बैंक बैलेंस हैं, उसी अनुपात में उस की सामाजिक प्रतिष्ठा है। विद्वान बदहाल हैं, समाजसेवी कंगाल। तिजोरी में दफन काले धन के आगे भक्त अगरबत्ती जलाकर उसका नमन करते हैं सबेरे-सबेरे।

सेक्युलर हों या गैर-सेक्युलर सभी दल धर्म व जाति पर निर्भर हैं। सियासी विशेषज्ञ जाति व धर्म के आधार पर ही टिकट बांटते हैं। ऐसे लोग चुनाव भी जीत जाते हैं। यही क्या कम है कि इनमें से कुछ कभी-कभार देश के बारे में सोच भी लेते हैं। दिक्कत बस यही है कि जनता जैसे गिनती बढ़ाती है, काम न करने पर सूपड़ा भी वैसे ही साफ करती है।
गोपाल चतुर्वेदी

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