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मन की शांति

लोग अक्सर सोचते हैं कि शांति पाने के लिए संसार छोड़ना पड़ेगा। संसार यानी घर-गृहस्थी, परिवार, काम-धंधा। ओशो से जब लोग यह सवाल पूछते थे, तो वह कहते कि पहली बात, शांति पाने की कोशिश मत करें, अशांति को स्वीकार कर लें। आप शांत हो जाएंगे। फिर इस दुनिया में आपको कोई अशांत नहीं कर सकता। यह बात अजीब लग सकती है। शांति का उपाय खोजने पहुंचे थे और उन्होंने उल्टे अशांति में झोंक दिया।

लेकिन अगर हम ठीक से मन की प्रक्रिया को समझ लें, तो जीवन बदला जा सकता है। प्रक्रिया यह है कि मन हमेशा चीजों को दो भाग में तोड़ लेता है। जैसे मान-अपमान, सुख-दुख, शांति-अशांति। और कहता है, एक हिस्सा नहीं चाहिए, दूसरा चाहिए। यह मन का खेल है। दरअसल, कोई भी एक हिस्सा हाथ आ ही नहीं सकता। क्या आप एक फूल हाथ में लेकर कह सकते हैं कि मुझे पंखुड़ियों का अंदर का हिस्सा चाहिए, बाहर का नहीं? 

इस मन से बचने के दो उपाय हैं। या तो दोनों के लिए राजी हो जाएं, मन मर जाएगा। या फिर दोनों को छोड़ दें, तो भी मन मर जाएगा। जो आपके लिए अनुकूल मालूम पड़े, वैसा कर लें। अन्यथा आपके शांत होने का कोई उपाय नहीं है। जब तक आप शांत होना चाहते हैं, तब तक शांत न हो सकेंगे। जब तक आप सुखी होना चाहते हैं, दुख आपका भाग्य होगा। शांत होने का कोई एक मंत्र नहीं है, और न कोई विधि है।

एक प्रयोग करके देखें, सिर्फ 24 घंटे, ज्यादा नहीं। तय कर लें कि आज सुबह छह बजे से कल सुबह छह बजे तक जो भी होगा, उसको हम स्वीकार कर लेंगे। उसका जरा भी विरोध नहीं करेंगे। देखें, चौबीस घंटे में आपकी जिंदगी में एक नई हवा का प्रवेश हो जाएगा। जैसे कोई झरोखा अचानक खुल गया और ताजी हवा आपकी जिंदगी में आनी शुरू हो गई। एक दफा इसका अनुभव हो जाए, फिर आप इसमें गहरे उतरने लगेंगे।
अमृत साधना

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