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भंग की तरंग का दोष

दोष मतदाताओं का नहीं है। यकीन मानिए, यह दोष मौसम का है। फागुन का महीना होता ही इतना मादक है। इसमें अच्छे से अच्छा आदमी तक बौरा जाता है। ये तो फिर भी मतदाता थे। और जब पानी में भंग घुली हुई हो, तो अच्छे-बुरे का फर्क कौन कर पाता है भला। तरंग में जो हो गया, सो हो गया। अब उत्तराखंड को ही ले लीजिए। मतदाता भ्रष्टाचार से परेशान थे। उनका मूड भांपकर भाजपा ने मुख्यमंत्री रमेशचंद्र पोखरियाल ‘निशंक’ को हटाकर कथित ईमानदार, मेहनती और कर्मठ बीसी खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाया। चुनाव में जनता ने खंडूड़ी को हरा दिया और कथित रूप से भ्रष्ट पोखरियाल को जिता दिया। अब ऐसा तो कोई भंग की तरंग में ही कर सकता है।

इधर, मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का इतना अच्छा पाठ पढ़ाया था जनता को। लेकिन फागुन आया, तो उसे सिविल इंजीनियरिंग में इतनी खोट दिखी कि सोशल इंजीनियरिंग की धज्जियां उड़ गईं। दरअसल, चुनाव आयोग ने महीना ही गलत चुना था मतदान के लिए। फागुन में वोट पड़े, तो सब गड़बड़ हो गई। जिस बादल परिवार पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगाए जा रहे थे, उसी परिवार को जनता ने फिर सत्ता सौंप दी। पंजाब के मतदाताओं ने तो शराब भी नहीं पी थी, क्योंकि लाखों लीटर शराब चुनाव आयोग ने पहले ही जब्त कर ली थी। यह तो हवा में घुली भंग की तरंग का असर है। पत्रकार व सेफोलॉजिस्ट परेशान हैं। अब वे चाहते हैं कि चुनाव आयोग अगली बार इस मौसम में चुनाव करवाए, तो फागुनी बयार पर पहले रोक लगाए।
बीबीसी में विनोद वर्मा

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