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यूपी में भाजपा के दिग्गजों की साख पर सवाल!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में इस मुद्दे को लेकर मंथन शुरू हो गया है कि 'क्या प्रदेश में पार्टी के दिग्गज सांसदों की इतनी भी साख नहीं बची है कि वे अपने संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के एक भी उम्मीदवार को जीत दिला सकें?'

भाजपा के दिग्गज नेता और पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह गाजियाबाद से सांसद हैं। लेकिन उनके संसदीय क्षेत्र में आने वाली पांच विधानसभा सीटों में से भाजपा को एक भी सीट नहीं मिल पाई। तीन सीटों पर तो भाजपा मुकाबले से भी बाहर थी।

कुछ ऐसा ही हाल आजमगढ़ से भाजपा सांसद रमाकांत यादव के संसदीय क्षेत्र का है। पार्टी में उन्हें पिछड़े नेता के रूप में काफी तवज्जो दी जाती है। पूर्वांचल के कई विधानसभा क्षेत्रों में उनके कहने पर ही टिकट दिए गए, लेकिन पार्टी यहां भी खाता नहीं खोल पाई।

उत्तर प्रदेश की सियासत के केंद्र लखनऊ से कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सांसद हुआ करते थे। फिलहाल यहां की कमान लालजी टंडन के हाथों में है, लेकिन उनकी राजनीतिक हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने बेटे गोपाल टंडन को भी नहीं जिता पाए।

लखनऊ  की नौ विधानसभा सीटों पर कभी भाजपा का कब्जा हुआ करता था, लेकिन अब स्थिति बिल्कुल उलट है। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र बस किसी तरह अपनी सीट निकालने में कामयाब रहे और बाकी की सीटें भाजपा के हाथ से निकल गईं।

भाजपा के 'भगवाधारी' चेहरों की बात करें तो गोरखपुर से सांसद आदित्यनाथ का कद पार्टी में बहुत मायने रखता है, लेकिन इस बार गोरखपुर में भी पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। गोरखपुर शहर से भाजपा प्रत्याशी राधामोहन अग्रवाल की जीत हुई है, लेकिन योगी उन्हें टिकट दिए जाने के खिलाफ थे।

इस चुनाव में पार्टी के दो अन्य कद्दावर नेता आंवला से सांसद मेनका गांधी और पीलीभीत से उनके सांसद बेटे वरुण गांधी की साख भी गिरी है। दोनों संसदीय क्षेत्रों से पार्टी की झोली में केवल एक-एक विधानसभा सीट आई।

इससे पहले वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 88 विधायकों के आंकड़े से गिरकर 51 पर आ गई थी और इस बार उससे भी नीचे गिरकर 47 पर पहुंच गई। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि यदि भाजपा नेताओं ने समय रहते अपनी साख नहीं सुधारी तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से उनका भी सफाया हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार अभयानंद शुक्ल कहते हैं, ''भाजपा के पास अब खोने को कुछ नहीं बचा है। लेकिन समय रहते उसने यदि अपनी रणनीति में फेरबदल नहीं किया तो लोकसभा चुनाव में उसे अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ सकता है।''

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