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सिर्फ 26 सौ रुपये में लड़ा था चुनाव

परिचय- महेश चंद शर्मा
वर्ष 1971 से लेकर तीन बार एमसीडी में पार्षद रहे। 1998 में उप महापौर, 1999 में महापौर और 2000-2002 तक सदन के नेता रहे।

मैं पेशे से अध्यापक था। पार्टी के निर्देश पर 1971 में जब पहली बार दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के चुनाव में खड़ा हुआ तो मेरे पास चुनावी खर्च के लिए पैसे तक नहीं थे। सिर्फ 2600 रुपये में मैने पूरा चुनाव लड़ा और उस वक्त कांग्रेस के नामी नेता लक्ष्मीनारायण को शिकस्त दी। लोगों को उस समय किसी नेता के नाम से अधिक जनता के बीच जाने वाले या उनके सुख-दु:ख में खड़े होने वाले पर अधिक भरोसा था। शायद यही वजह रही कि मुझे जनता ने तीन बार चुना।

एक जमाना था कि चुनाव में बेहतर उम्मीदवार खड़े करने के लिए पार्टियां प्रतिष्ठित लोगों के पास जाकर उनसे चुनाव लड़ने का आग्रह करती थीं। मगर, आज स्थितियां एकदम विपरीत हो गई हैं।

उस जमाने में एमसीडी में भी एक अलग ही माहौल हुआ करता था। चुनाव के वक्त ओछे हथकंडें नहीं अपनाए जाते थे और पार्टी टिकट के लिए भी मारामारी नहीं थी। तब एमसीडी इतनी दमदार हुआ करती थी कि मेयर की भी अलग प्रतिष्ठा थी। दिल्ली के विकास में एमसीडी का रोल महत्वपूर्ण होता था। उस समय अवैध बस्तियों की समस्या नहीं थी। बिजली, पानी, सीवर, यातायात, शिक्षा और स्वास्थ्य इनसे जुड़े कार्य को एमसीडी बखूबी निभाता था। चुनाव के बाद एमसीडी के पार्षद व मेयर सभी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सिर्फ जनता के हित में सोचते थे। मगर, आज के दौर में एमसीडी की स्थिति जैसी हो रही है, उसके लिए पार्षदों की छवि भी मुख्य कारण है। वैसे एमसीडी में अब पहले जैसी बात भी नहीं रही।
(निशांत राघव से बातचीत पर आधारित)

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