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मुकदमों की पेन्डेंसी में कानपुर नंबर वन

अपना शहर प्रदूषण, अपराध, ट्रैफिक अव्यवस्था के बाद मुकदमों की पेन्डेंसी में भी पूरे देश में नम्बर वन बन गया है। देश में सबसे ज्यादा मुकदमे अपने प्रदेश में लम्बित चल रहे हैं। जिसमें कानपुर ने सबको पीछे छोड़ दिया है। यहां मुकदमों की पेन्डेंसी का ग्राफ पिछले तीन सालों में एकदम से बढ़ा है। इसका सबसे बड़ा कारण यहां पर बढ़ता अपराध और समय से गवाहों का पेश न होना है। वहीं सिक्किम में मुकदमों की पेन्डेंसी सबसे कम है। यहां पर लोवर में 1276 और हाईकोर्ट में सिर्फ 33 मामले लम्बित हैं।

देश में हर दिन मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है। वर्तमान समय में देश में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमें लम्बित चल रहे हैं। देश में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मुकदमे लम्बित हैं। प्रदेश में लोवर में 54 लाख से ज्यादा और हाईकोर्ट में 95 हजार से ज्यादा मुकदमे लम्बित हैं। यूपी के बाद दूसरे नम्बर पर महाराष्ट्र है। यहां पर लोवर में 41 लाख से ज्यादा और हाईकोर्ट में 3 लाख से ज्यादा मुकदमें लम्बित हैं। अपने प्रदेश में मुकदमों की पेन्डेन्सी में कानपुर नम्बर वन है। वर्तमान समय में कानपुर नगर न्यायालयों में दो लाख से अधिक मुकदमें लम्बित हैं। जिसमें सेशन ट्रायल के 14547 मुकदमें, सिविल के 49028 और मजिस्ट्रेट कोर्ट में 129702 मुकदमे लम्बित हैं।

मुकदमों की पेन्डेंसी का सबसे बड़ा कारण गवाहों का समय से पेशी पर न आना या फिर फरार चल रहे अभियुक्तों की गिरफ्तारी न होना है। पुलिसवाले गवाही में सबसे ज्यादा मुंह चुराते हैं। ज्यादातर मामलों में तो गैरजमानती वारण्ट जारी होने के बाद ही पुलिसवाले गवाही के लिए पेश हुए हैं। वरिष्ठ शासकीय अधिवक्ता कौशल किशोर शर्मा ने बताया कि सन् 2000 में अशोक लिनेंट फाइनेंस बनाम रीयल सेल्स का इजरा दाखिल किया था। जिसमें अधिवक्ता अपनी निजी समस्या को आधार बनाकर तारीख बढ़ावा लेते हैं। जिसके कारण मुकदमा लम्बित है। मुकदमों की पेन्डेंसी को रोकने के लिए स्थगन प्रार्थना पत्र तीन से ज्यादा न लिए जाने का नियम बनाना चाहिए। इससे मुकदमों की सुनवाई तीन बार से ज्यादा नही टल सकेंगी। साथ ही पुराने मुकदमों को प्राथमिकता के आधार पर पहले सुने जाने का नियम भी बनाया जाना चाहिए ताकि उनका निस्तारण हो सके ।

मुकदमों के बढ़ते बोझ को देखते हुए यहां पर कोर्ट की संख्या बढ़ा देनी चाहिए। बार एसोसिएशन चीफ जस्टिस को चिट्ठी भेजकर कोर्ट की संख्या बढ़ाने की मांग करेंगी। शिवाकान्त दीक्षित, युवा अधिवक्ता

मुकदमों की पेन्डेंसी पर हाईकोर्ट भी गंभीर है। हाईकोर्ट के निर्देश पर सुलह समझौता के आधार पर मामलों का निस्तारण करने की पहल की गई है। इससे मुकदमों का बोझ तो कम हुआ है लेकिन पेन्डेंसी नही। मुकदमों की पेन्डेंसी कम करने के लिए अदालतों को बढ़ाने की आवश्यकता है। अजय सिंह भदौरिया, वरिष्ठ अधिवक्ता

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