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दोपहर की नींद

गत सप्ताह छह तारीख को हमारे वक्त के संभवत: सबसे ज्यादा चर्चित कथाशिल्पी व नोबेल पुरस्कार विजेता गेब्रियल गार्शिया मार्खेज 85 वर्ष के हो गए। यहां प्रस्तुत है उनकी एक बेहद मार्मिक कहानी।

रेल भागती हुई पथरीली सुरंग से बाहर निकल कर, अंतहीन-से लगने वाले केलों के बगीचों के बीच से होती हुई जा रही थी। हवा में आर्द्रता थी और वे दोनों समुद्री हवाओं से बहुत दूर निकल आई थीं। दमघोंटू धुआं डिब्बे के अंदर चला आया। रेललाइन के साथ-साथ लगने वाली पतली-सी सड़क पर बैलगाड़ियां चल रही थीं। केलों के ढेर लादे हुए, सड़क के पार कुछ इमारतें भी नजर आ रही थीं, जिनमें टेरेस पर बिजली के पंखे नजर आ जाते थे। कहीं-कहीं केले के बगीचों के मालिकों के छोटे-छोटे दफ्तर भी नजर आ रहे थे। ग्यारह बज रहे थे, लेकिन अभी गर्मी तेज नहीं थी।

‘खिड़की बंद कर दो।’ औरत ने अपनी लड़की से कहा, ‘तुम्हारे बालों में गर्द जम जाएगी।’
लड़की खिड़की बंद करने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसमें जंग लगा होने के कारण बंद न हो सकी।
तीसरी श्रेणी के इस डिब्बे में सिर्फ वे दोनों थीं। लड़की धुएं से बचने के लिए खिड़की के पास से उठ गई। उसने प्लास्टिक की थैली, जिसमें खाने की कुछ चीजें थीं और अखबार में लिपटा हुआ एक फूलों का गुलदस्ता वहीं बेंच पर छोड़ दिया। वह खिड़की से हट कर अपनी मां की ओर मुंह करके सामने वाली सीट पर बैठ गई। दोनों ने सस्ते-से मातमी लिबास पहन रखे थे।

लड़की बारह साल की थी और वह पहली बार रेलगाड़ी में बैठी थी। उसकी उम्र के लिहाज से उसकी मां बहुत बूढ़ी लग रही थी। उसकी पलकों पर नीली-नीली नसें उभर आई थीं। चुस्त और लम्बे लिबास में उसकी छोटी देह, नर्म थी, लेकिन सपाट। उसकी पीठ सीट से चिपकी हुई थी, उसके हाथों ने गोद में पड़े अपने पेटेंट चमड़े के हैंडबैग को संभाला हुआ था। उसके चेहरे पर निर्धन होने का एहसास था, लेकिन शांत। बारह बजते-बजते गर्मी तेज होने लगी। ट्रेन एक वीरान-से स्टेशन पर पानी लेने के लिए दस मिनट को ठहरी।

गाड़ी चली तो धीमी रफ्तार से। बीच में दो छोटे कस्बों में रुकी। औरत सो रही थी। लड़की ने अपने जूते उतार दिए। गुलदस्ते पर पानी के छींटे मारने के लिए उसे उठाकर अंदर गुसलखाने में ले गई। वापस आई तो मां ने प्लास्टिक की थैली से खाने की चीजें निकाल ली थीं।

जब वे दोनों खाने में लगी थीं, तब गाड़ी लोहे के एक पुल को धीरे-धीरे पार कर रही थी। गाड़ी एक और कस्बे से होकर गुजरी। एक जगह भीड़ जमा थी, और कुछ बैण्ड-बाजे वाले तेज सूरज के नीचे खड़े होकर एक मधुर धुन बजा रहे थे। केले के बगीचे जहां खत्म होते नजर आ रहे थे, वहां जमीन पर दरारें दीख रही थीं, अकाल से पड़ने वाली दरारें।

औरत ने अपना खाना खत्म कर लड़की से कहा, ‘जूते पहन हो,’ लड़की ने बाहर देखा, खाली मैदान नजर आ रहे थे और गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली थी। उसने केक के बचे हुए टुकड़े को प्लास्टिक की थैली में डाला और जूते पहनने लगी। औरत ने उसे कंघी दी- बाल संवारो।

गाड़ी सीटी बजाने लगी। औरत ने अपने गले से पसीना पोंछा और फिर मुंह पोंछने लगी। लड़की ने बाल संवार लिए थे। गाड़ी अब एक शहर में से होकर गुजरने लगी थी, शहर वीरान-सा था।

‘कुछ करना हो तो कर लो,’ औरत ने कहा, ‘बाद में पानी-वानी पीना चाहो तो बिल्कुल न पीना, चाहे प्यास से जान निकल रही हो, और हां, रोना-धोना बिल्कुल नहीं।’

लड़की ने अपना सिर हिलाया। इंजन की सीटी और पुराने डिब्बों की खड़खड़ाहट के साथ एक गर्म हवा का झोंका खिड़की के अंदर आ गया। औरत ने प्लास्टिक का थैला हैंडबैग में डाल लिया। उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे। गाड़ी ने सीटी दी और धीमी हो गई। कुछ देर बाद रुक गई।

स्टेशन बिल्कुल खाली था। सड़क से दूसरी ओर फुटपाथ था, बादाम के पेड़ों की छाया थी और एक बड़ा-सा हॉल खुला हुआ था। गर्मी शहर में जैसे तैर रही थी। दोनों गाड़ी से उतरीं और सड़क के पार छांव-भरे फुटपाथ पर चलने लगीं। दो बज रहे थे। आलस के बोझ से दबा हुआ शहर उस समय दोपहर की नींद ले रहा था। दुकानें, दफ्तर और स्कूल ग्यारह बजे बंद हो जाते थे और चार बजने से कुछ ही देर पहले खुलते थे। सिर्फ स्टेशन के पास वाला एक होटल, वह हॉल और तारघर खुले रहते थे। दोनों अब बादाम के पेड़ों की छांव तले चलते हुए शहर के अंदर आ गई थीं। वे दोनों एक गिरजे-सी लगने वाली जगह के सामने वाले मकान में पहुंचीं। औरत ने एक दरवाजे पर हल्का-सा धक्का दिया। अंदर पंखे के चलने की आवाज आ रही थी। दरवाजे में चरमराहट हुई, ‘कौन है?’

‘फादर से मिलना चाहती हूं।’
‘अभी सो रहे हैं।’
‘बहुत ही जरूरी काम है,’ औरत के स्वर में दृढ़ता थी।
चुपके से दरवाजा थोड़ा-सा खुला। एक मोटी-सी बूढ़ी औरत का चेहरा नजर आया। उसकी चमड़ी का रंग पीला था और बालों का रंग लोहे की तरह। मोटे शीशों वाले चश्मे के पीछे उसकी आंखें बेहद छोटी लग रही थीं।

‘अंदर आ जाओ।’ उसने कहा।
वे अंदर कमरे में गईं, जो बासी फूलों की गंध से महक रहा था। उस मोटी औरत ने लकड़ी का एक बेंच दिखा कर उन्हें बैठने का इशारा किया। लड़की बैठ गई, उसकी मां अपने हैंडबैग को मजबूती से पकड़े हुए, अनिश्चित-सी खड़ी रही। कमरे में पंखे की आवाज तैर रही थी।

मौटी औरत दूसरे कमरे से लौट कर एक दरवाजे पर खड़ी हो गई। ‘कह रहे हैं तीन बजे के बाद आएं।’ वह बहुत धीमी आवाज में कह रही थी, ‘अभी पांच मिनट पहले लेटे हैं।’

‘साढ़े तीन बजे की गाड़ी पकड़नी है।’ औरत ने कहा।
वह थोड़ा ही बोली, लेकिन उसकी आवाज भली लग रही थी। मोटी औरत पहली बार मुस्कराई।
‘ठीक है।’ उसने कहा।

वह दरवाजा फिर बंद हो गया। वह अपनी लड़की के साथ ही बैठ गई। कमरा सादा-सा था, लेकिन साफ-सुथरा।
इस बार दरवाज खुलने पर स्वयं फादर बाहर निकल आया, रुमाल से अपने चश्मे का कांच पोंछता हुआ। जैसे ही उसने चश्मा पहना, साफ हो गया कि वह उस औरत का भाई ही है।

‘क्या मदद कर सकता हूं?’
‘कब्रिस्तान की चाबी चाहिए।’
लड़की गुलदस्ता गोद में रखे, टांग पर टांग चढ़ाए बैठी हुई थी। फादर ने पहले उसे देखा, फिर उसकी मां को, फिर वह खिड़की से बाहर मेघरहित आकाश की ओर देखने लगा।
‘इतनी गर्मी में,’ उसने कहा, ‘धूप नरम पड़ने तक इंतजार कर लो।’

औरत ने खामोशी से अपना सिर हिला दिया। फादर ने एक अलमारी खोली। उसके अंदर से नोटबुक निकाली। एक कलम और दवात भी और उन्हें मेज पर रखकर बैठ गया।

‘किस कब्र पर जाना है?’ उसने पूछा।
‘कालरेस सेंतेनो की।’ औरत ने जवाब दिया।
‘कौन?’
‘कालरेस सेंतेनो।’ औरत ने दोहराया। फादर की समझ में अभी तक नहीं आया था।
‘वही चोर, जो पिछले हफ्ते यहां मारा गया था।’ औरत ने उसी तरह कहा, ‘मैं उसकी मां हूं।’

फादर ने ध्यान से उसे देखा, वह भी उसे घूरने लगी। फादर ने अपनी आंखें मोड़ लीं। वह सिर झुका कर कुछ लिखने लगा। उसने लिखते-लिखते उससे उसका पता-ठिकाना पूछा। वह इस तरह बताने लगी जैसे वह कुछ पढ़ रही हो। फादर पसीना-पसीना हो रहा था। लड़की ने अपने दोनों जूते खाल कर पैर बेंच पर टिका दिए थे।

पिछले सोमवार की घटना थी। यहां से कुछ दूर एक मकान में रैबेका नाम की एक विधवा ने कुछ आवाज सुनी। बारिश हो रही थी, उसे लगा कि सामने वाले दरवाजे को कोई जबरदस्ती खोलना चाहता है। उसने सतर्कता के साथ अपनी अलमारी से एक पुराना रिवॉल्वर निकाला और अंधेरे में ही बैठक-घर में चली गई। पिछले अट्ठाइस वर्षों ने उसके भीतर एक अजीब-से भय की सृष्टि कर दी थी। वह उसी भय के प्रभाव में आंखें बंद किए हुए दरवाजे तक पहुंची। अंदाजे से उसने दरवाजे के छेद पर रिवॉल्वर की नली रखी और उसी तरह आंखें बंद किए हुए घोड़ा दबा दिया। अपने जीवन में उसने पहली बार पिस्तौल चलाई थी। गोली छूटने के तुरंत बाद भी उसे टीन की चादर वाली छत पर बारिश की आवाज सुनाई पड़ी। फिर तभी उसने बरामदे पर कुछ भारी-सी चीज गिरने की आवाज सुनी। कोई कराहा, ‘आह, मां!’

अगले दिन सुबह लोगों ने देखा, उस आदमी की नाक उड़ गई थी। उसके शरीर पर एक धारियों वाली कमीज थी, उसने पैंट पर बेल्ट की बजाय रस्सी कसी हुई थी और नंगे पैर था, शहर में किसी ने उसे नहीं पहचाना।
‘तो उसका नाम था कालरेस सेंतेनो।’ फादर बुदबुदाया। वह लिख चुका था।

‘कालरेस सेंतेनो अयाला,’ औरत बोली, ‘मेरा इकलौता लड़का था।’
फादर ने अलमारी के पास जाकर उसे खोला और उसके अंदर से दो जंग लगी चाबियां निकालीं। उसने चाबियां नोटबुक पर रखीं और उस जगह की ओर इशारा करके कुछ दिखाने लगा, जहां वह लिखता रहा था- ‘दस्तखत करो।’

औरत ने नोटबुक पर अपना नाम लिख दिया। लड़की ध्यान से अपनी मां का चेहरा देखने लगी।
फादर ने आह भरी।
‘तुमने उसे कभी रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं की?’
‘वह अंधा था।’

फादर ने पहले औरत को देखा, फिर लड़की को, और यह उसे बेहद आश्चर्यजनक लगा कि वे दोनों नहीं रोयीं।
औरत कह रही थी, ‘मैं उससे कहती रहती थी कि वह कभी किसी के खाने की चीज न चुराए। उसे बॉक्सिंग का बेहद शौक था और वह अक्सर चोटें खाकर तीन-तीन दिन बिस्तर पर पड़ा रहता था।’

‘उसे अपने सारे दांत निकलवाने पड़े थे।’ लड़की ने दखल दिया।
‘ठीक कह रही है, जब भी मैं खाने बैठती तो मुझे अपने बेटे पर पड़ी हुई मार की याद आ जाती। लगता जैसे मेरे मुंह पर घूंसों की मार पड़ी हो और...’

‘परमात्मा की इच्छा कौन टाल सकता है।’ फादर बोले।
उसका स्वर सपाट था, शायद एक तो अनुभव के कारण वह कुछ शंकालु स्वभाव का हो गया था। दूसरे, गर्मी के कारण भी, उसने उन्हें लू से बचने के लिए सिर ढंक लेने को कहा, उसने उबासी ली तो उनींदा-सा लग रहा था। उसने उन्हें कालरेस सेंतेनो की कब्र तक पहुंचने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश बताए। उसने यह भी कहा कि वापसी में दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं। चाबी दरवाजे के नीचे रख दी जाए, वहीं हो सके तो गिरजा के लिए चढ़ावा भी।

फादर ने महसूस किया कि बाहर से कोई अंदर देखने की कोशिश कर रहा था। दरअसल, बाहर बच्चे इकट्ठा थे। जैसे ही दरवाजा खुला वे इधर-उधर बिखर गए। ऐसे समय पर अक्सर सड़क खाली रहती थी। लेकिन अब बच्चे ही नहीं थे। काफी बड़ी उम्र के लोग भी बातम के पेड़ों के नीचे इकट्ठा होने लगे थे। फादर ने एक बार सड़क की चिलचिलाती धूप का मुआयना किया, बात उसकी समझ में आ गई थी, धीरे से उसने दरवाजा फिर से बंद कर दिया।

‘जरा ठहरो!’ उसने औरत की ओर बिना देखे ही कहा। उसकी बहन भी कमरे में आ गई थी, उसने भाई की ओर चुपचाप देखा। ‘क्या बात थी?’ उसने पूछा।
‘लोगों को पता चल गया है।’ वह मद्धिम स्वर में बोली।
‘पीछे के दरवाजे से निकल जाओ, अच्छा रहेगा।’

‘यही हालत है,’ वह बोली, ‘लोग अपनी खिड़कियों पर जमा हो गए हैं।’ यह सब औरत की समझ में नहीं आ रहा था। उसने खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की। उसने लड़की के हाथ से गुलदस्ता ले लिया और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी। लड़की उसके पीछे-पीछे हो ली।

‘धूप कम होने तक इंतजार कर लो।’ फादर ने पीछे से कहा।
‘धूप तेज है,’ उसकी बहन बोली, ‘छतरी ले जाओ।’
‘धन्यवाद,’ औरत ने जवाब दिया, ‘हम ऐसे ही ठीक हैं।’ उसने लड़की का हाथ पकड़ा और दोनों चल पड़ीं।
(अनुवाद: देवेन्द्र मोहन)

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