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खेल का सच

मैदान में खेले जाने वाले खेल की तारें अक्सर चारदीवारी के बीच खेले जाने वाले खेल से जुड़ी होती हैं। यह ऐसा सच है, जिससे आज की दुनिया में कमोबेश सब परिचित हैं। उपन्यास भी कुछ इसी तरह के खेल पर से पर्दा हटाने का अपने तरीके से प्रयास करता है। लेखक ने प्रमुख पात्रों के जरिए खेल को जीवन की रोजमर्रा की घटनाओं से ही जोड़ने का प्रयास किया है।

लेखक की मंशा यहां खुद जीवन को ही एक खेल का रूप देने की लगती है, एक मैदान के रूप में, जहां सब अपने-अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में जीतोड़ भागदौड़ कर रहे हैं। जिन पात्रों में आदर्श रूप की झलक देखने की कोशिश की जाती है, इस संघर्ष में वह भी बेदाग नहीं रह पाते।
खेलगुरु, लेखक: रमेश दवे, प्रकाशक: सामयिक प्रकाशक, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली-2, मूल्य: 495 रु.

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