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सच और झूठ की जंग

समाज में सच और झूठ पर बहस हमेशा चलते रहने की गुंजाइश शुरू से ही रही है। आज भी इसका स्वरूप कुछ बदला नहीं, बल्कि अगर उस पर नए सिरे से बहस चलती भी है और इसी में कुछेक वर्गों का हित भी सधता है। बशर्तें, वह बहस तमाम निष्कर्षो से कोसों दूर रहती हों। 

प्रस्तुत उपन्यास इन्हीं बहस-मुबाहिसों के बीच शोषण की चल रही उस चाकी का एक रूप सामने रखती है, जो बिना रुके पीसती है। उसमें पिसते घुनों में से कोई यदा-कदा बच निकलता है और अपनी कहानी सुना डालता है। उपन्यास अपने मूल में कुछ ऐसे ही हालात को उकेरने का प्रयास करता है। आज के समय का सच और उस सच के पीछे के अनेकानेक झूठ पकड़ने की कोशिश में लेखक परत दर परत राजनीतिक तंत्र में झांकता है।
चलती चाकी, लेखक: सूर्यनाथ सिंह, प्रकाशक: सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली-2, मूल्य: 395 रु.

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