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आकांक्षाओं के आकाश पर अखिलेश

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का सत्ता में आना महज संयोग नहीं है। इसके लिए उन्होंने भरपूर मेहनत की और जनता ने भी इस नौजवान में अपना आसरा देखा। मुझे विश्वास है कि अखिलेश जानते होंगे कि उनके लिए यह गौरव से ज्यादा जिम्मेदारी की बात है।

तुलना अजीब सी लगेगी, पर है बहुत सटीक। 1984 में जब राजीव गांधी जबर्दस्त बहुमत के साथ साउथ ब्लॉक पर काबिज हुए थे, तब समूचा हिन्दुस्तान उनकी ओर टकटकी लगाकर देख रहा था। वह देश के सबसे नौजवान प्रधानमंत्री थे और जनता ने उनके कंधों पर जिम्मेदारियों का भारी बोझ रख दिया था। जानने वाले जानते हैं कि राजीव ने ही उस संचार क्रांति की नींव रखी थी, जिसकी तेज गति आज भारत को तरक्की के रास्ते पर दौड़ा रही है, पर पार्टी में ही ऐसे बहुत से लोग थे, जो उन्हें नेता नहीं मानते थे। इसका परिणाम क्या हुआ हम सब जानते हैं।

पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह खुद को मिस्टर क्लीन साबित करते हुए पार्टी से बाहर निकले और फिर उन्होंने उन लोगों से हाथ मिला लिया, जिनके डीएनए की सबसे बड़ी खासियत गांधी परिवार और कांग्रेस के प्रति कटुता थी। अच्छा-भला काम करते हुए राजीव पर बोफोर्स सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप लग गया। ऐसा आरोप, जिसे खुद विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनका साथ निभा रहे लोग सत्ता में रहने के बावजूद कभी साबित नहीं कर सके। कहने की जरूरत नहीं कि अखिलेश यादव को सावधान रहना होगा। जनता की उम्मीदों और अपनी पार्टी की एकता का खयाल रखते हुए उन्हें हर कदम सावधानी से उठाना होगा।

यह तो खैर है कि अभी मुलायम सिंह का दमखम बाकी है। उम्मीद है वह अपने पुत्र और अब पार्टी के खेवैया अखिलेश का मार्गदर्शन करते रहेंगे। पर ऐसा बहुत कुछ है, जो सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव को करना होगा। समाजवादी पार्टी की अपनी रीति-नीति रही है। वर्षो से लोग नेताजी के साथ लड़ते-खपते आए हैं। पिछले पांच साल उन सभी के ऊपर बेहद भारी गुजरे हैं। ऐसे में खुद को प्रतिशोध की राजनीति से अलग रखते हुए इंसाफ पसंद निजाम देना यकीनन उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

उन्हें यह भी याद रखना होगा कि उत्तर प्रदेश में 2007 में भी आम आदमी ने मायावती को बहुमत की ताकत के साथ सत्ता सदन में पहुंचाया था। लोग चाहते थे कि वह उनके दुख-दर्द दूर करें, पर ऐसा हुआ नहीं। जिस भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के खात्मे के नारे के साथ बसपा ने चुनाव लड़ा था, वे उसके वक्त में भी सुर्खियों में बने रहे। उदाहरण तो बहुत से हैं, पर अकेले एनआरएचएम घोटाले को ही याद कर लें। इसके चलते दो मुख्य चिकित्सा अधिकारी प्रदेश की राजधानी में सरेराह गोलियों से भून दिए गए। एक अधिकारी ने जेल में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली।

तत्कालीन मुख्यमंत्री के सबसे नजदीकी रहे बाबू सिंह कुशवाहा इस समय सीबीआई की कस्टडी में हैं। उन्होंने खुलेआम आरोप लगाया था कि मैं बलि का बकरा बना दिया गया हूं। मुझे मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव और आला पुलिस अफसरों से जान का खतरा है। कहने की जरूरत नहीं, पहले हो चुकी तीन अकाल मौतें उनके आरोप को प्रथम दृष्टया गलत साबित नहीं करती थीं। उत्तर प्रदेश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब मुख्यमंत्री के करीबी मंत्री ने उनके निकटस्थ अधिकारियों से खुद की जान को खतरा बताया।

निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश के लोगों ने इसका नोटिस लिया। वे खुद को छला हुआ महसूस करने लगे, जब अखिलेश यादव ने पार्टी में आपराधिक तत्वों की आमद के खिलाफ मुहिम छेड़ी, तो उन्हें सुकून का अहसास हुआ। इसके उलट कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सार्थक विकल्प बनने की बजाय आत्ममुग्धता के दौर से गुजर रहे थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने बहुत मेहनत की। 20 साल बाद यह पहला चुनाव था, जब कांग्रेस हर विधानसभा क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी, पर टिकट वितरण में खोखले लोगों का चयन, कार्यकर्ताओं का अभाव और बेलगाम बड़े नेताओं की भरमार इस परिश्रम पर पानी फेर गई।

उधर भारतीय जनता पार्टी का खोखलापन तो पहले दिन से ही जाहिर हो रहा था, पार्टी ने पुराने क्षत्रपों पर विश्वास किए बिना उमा भारती को मध्य प्रदेश से आयात कर लिया और बतौर भावी मुख्यमंत्री यहां के लोगों पर थोप दिया। कहने की जरूरत नहीं कि उमा भारती मध्य प्रदेश में कोई करिश्मा वर्षों से नहीं कर सकी हैं, इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें सिर्फ इसलिए कल्याण सिंह का विकल्प मान लिया, क्योंकि जन्मना वह लोध राजपूत हैं। ठीक वैसे ही, जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों में गले तक डूबे हुए बाबू सिंह कुशवाहा को कुशवाहा समाज का एकमात्र नेता मान लिया गया। परिणाम साफ है। अलग-अलग वजहों से दोनों राष्ट्रीय पार्टियां एक बार फिर मौका गंवा बैठीं।

जब नई दिल्ली में राष्ट्रीय पार्टियों के नेता उत्तर प्रदेश का फैसला कर रहे थे, तब मुलायम सिंह यादव और अखिलेश गांव-गांव घूम रहे थे। अमर सिंह के जाने के बाद पार्टी ने खुद को बड़बोलेपन से मुक्त कर लिया था। संयम भरी सुव्यवस्थित भाषा उनका रास्ता साफ कर रही थी। आजम खान जैसे नेता घर लौट आए थे और डीपी यादव जैसे लोगों के लिए दरवाजे बंद कर दिए गए थे। यह तो थी चुनाव की बात। पर भूलना नहीं चाहिए कि पिछले पांच बरस से सिर्फ और सिर्फ समाजवादी पार्टी सियासी तौर पर बहुजन समाज पार्टी से लोहा लेती आ रही थी। ‘नेता जी’ ने अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल नहीं टूटने दिया था। परिणाम सामने हैं।

मतलब साफ है। उत्तर प्रदेश के लोगों ने जहां राष्ट्रीय पार्टियों को यह सबक सिखाया है कि आप हमें मुफ्त का मोती न मानें, वहीं समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत देकर अपनी आकांक्षाएं भी साफ कर दी हैं। हर रोज नौजवान होता यह प्रदेश अब खुद को बीमारू सूबों की सूची से हटाना चाहता है। समाजवादी पार्टी से उसको उम्मीद है कि वह सुशासन और विकास की नई परिभाषा गढ़ेगी। खिचड़ी सरकारों के पास एक बहाना हुआ करता है कि हमारा जनादेश खंडित है, इसलिए  हम चाहकर भी अपने सहयोगियों के दबाव में रहते हैं और मनचाहे तौर पर जनसेवा नहीं कर पाते। यह बहुमत समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ा अवसर है और अखिलेश के लिए सुदीर्घ और सफल सियासी जीवन का आमंत्रण भी। उम्मीद है, वह इस बहुमत का और मौके का सम्मान करेंगे।

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